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कथा रावण के वंश की

कथा रावण के वंश की

लेखक आनंद हठिला
सृष्टि के आदिकाल का समय था। चारों ओर केवल अथाह जलराशि थी। उसी अनंत जल के मध्य कमल पर विराजमान प्रजापति ब्रह्मा ने जब इस संसार की रचना आरंभ की तो उनके मन में एक चिंता उत्पन्न हुई। उन्होंने सोचा कि इस जीवनदायिनी जलराशि की रक्षा कौन करेगा? तब उन्होंने अनेक प्रकार के प्राणियों की उत्पत्ति की। वे सभी जीव भूख और प्यास से व्याकुल होकर ब्रह्मा जी के सामने उपस्थित हुए और विनम्र होकर बोले, "हे पितामह, हमारा कर्तव्य क्या होगा?" तब ब्रह्मा जी ने कहा, "तुम सब इस जल की रक्षा करो।" कुछ जीवों ने कहा, "हम यक्षण करेंगे," और वे यक्ष कहलाए। अन्य जीवों ने कहा, "हम इसकी रक्षा करेंगे," और वही आगे चलकर राक्षस कहलाए। इन्हीं राक्षसों के वंश में दो पराक्रमी भाई उत्पन्न हुए—हेति और प्रहेति। प्रहेति धर्मप्रिय था, इसलिए वह तपस्या के मार्ग पर चल पड़ा। किंतु हेति ने गृहस्थ जीवन अपनाया और काल की बहन भया से विवाह किया। उनके पुत्र का नाम विद्युतकेश रखा गया, जिसका तेज सूर्य के समान था।

समय बीता और विद्युतकेश का विवाह संध्या की पुत्री सालकटंका से हुआ। कुछ समय बाद उसने मंदराचल पर्वत पर एक तेजस्वी बालक को जन्म दिया, परंतु मोह और आसक्ति में पड़कर वह नवजात को वहीं छोड़कर अपने पति के साथ चली गई। वह बालक निर्जन पर्वत पर अकेला रोता रहा। उसी समय भगवान शिव माता पार्वती के साथ नंदी पर विहार करते हुए वहां पहुंचे। बालक का करुण रुदन सुनकर माता पार्वती का हृदय द्रवित हो उठा। उनकी करुणा देखकर भगवान शिव ने अपनी दिव्य शक्ति से उस शिशु को तुरंत युवा बना दिया और उसे आकाश में विचरण करने वाला दिव्य नगर प्रदान किया। माता पार्वती ने भी वरदान दिया कि भविष्य में राक्षसियों के पुत्र जन्म लेते ही युवावस्था को प्राप्त होंगे। यही बालक आगे चलकर सुकेश के नाम से प्रसिद्ध हुआ। भगवान शिव की कृपा से वह महान बलशाली और अजेय बन गया।

सुकेश का विवाह गंधर्व ग्रामणी की रूपवती पुत्री देववती से हुआ। उनके तीन पुत्र उत्पन्न हुए—माल्यवान, सुमाली और माली। तीनों बचपन से ही असाधारण पराक्रमी थे। जब उन्हें ज्ञात हुआ कि उनके पिता ने भगवान शिव की आराधना से यह वैभव प्राप्त किया है, तब उन्होंने भी सुमेरु पर्वत पर जाकर कठोर तपस्या आरंभ की। उनकी तपस्या इतनी प्रचंड थी कि देवता और ऋषि तक विचलित हो उठे। अंततः स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए और वर मांगने को कहा। तीनों भाइयों ने अमरता, युद्ध में अजेयता और आपसी प्रेम का वरदान मांगा। ब्रह्मा जी ने "तथास्तु" कहकर उन्हें वरदान प्रदान किया और अंतर्ध्यान हो गए।

वरदान प्राप्त करते ही तीनों भाइयों के भीतर अभिमान जाग उठा। वे देवशिल्पी विश्वकर्मा के पास पहुंचे और अपने योग्य नगर की मांग की। तब विश्वकर्मा ने उन्हें दक्षिण समुद्र के तट पर स्थित त्रिकूट पर्वत पर बनी स्वर्णमयी लंका का परिचय दिया। उन्होंने बताया कि यह नगरी अभेद्य है, चारों ओर स्वर्ण की प्राचीरें हैं और इसका वैभव स्वर्ग की अमरावती से भी कम नहीं। यह सुनकर तीनों भाई अपने विशाल राक्षस दल सहित लंका में जाकर बस गए। वहीं से राक्षसों का नया साम्राज्य आरंभ हुआ।

कालांतर में माल्यवान का विवाह सुंदरी से, सुमाली का विवाह केतुमती से और माली का विवाह वसुधा से हुआ। इन्हीं वंशों में अनेक पराक्रमी राक्षस उत्पन्न हुए। सुमाली की पुत्री कैकसी भी इन्हीं में से एक थी, जो आगे चलकर रावण, कुंभकर्ण और विभीषण की माता बनी। धीरे-धीरे तीनों भाइयों का आतंक तीनों लोकों में फैलने लगा। ब्रह्मा के वरदान ने उन्हें मृत्यु के भय से मुक्त कर दिया था। वे देवताओं के यज्ञ नष्ट करने लगे, ऋषियों को सताने लगे और धर्म का विनाश करने लगे। भयभीत देवता कैलाश पहुंचे और भगवान शिव से रक्षा की प्रार्थना की। किंतु भगवान शिव बोले, "सुकेश मेरा कृपापात्र है। उसके पुत्रों का वध मैं स्वयं नहीं कर सकता। तुम भगवान विष्णु की शरण में जाओ।"

देवता वैकुंठ पहुंचे और भगवान विष्णु से प्रार्थना की। भगवान श्रीहरि ने आश्वासन दिया, "भय मत करो। धर्म की रक्षा मेरा कर्तव्य है। मैं इन अधर्मी राक्षसों का अवश्य संहार करूंगा।" जब यह समाचार माल्यवान, सुमाली और माली तक पहुंचा तो वे क्रोध से भर उठे। उन्होंने विशाल सेना संग देवलोक पर चढ़ाई का निश्चय किया। उनके प्रस्थान के समय भयंकर अपशकुन हुए—आकाश से रक्त की वर्षा हुई, समुद्र उफन पड़े, पशु-पक्षी विचित्र स्वर करने लगे। किंतु अहंकार ने उनकी बुद्धि हर ली और वे किसी संकेत को समझ न सके।

रणभूमि में एक ओर करोड़ों राक्षसों की सेना थी और दूसरी ओर गरुड़ पर विराजमान भगवान श्रीहरि विष्णु। राक्षसों ने अस्त्रों की वर्षा आरंभ कर दी। तभी भगवान विष्णु ने अपना पांचजन्य शंख बजाया। उस शंखनाद से तीनों लोक कांप उठे। राक्षसों के हाथों से अस्त्र गिर पड़े, हाथी और घोड़े भयभीत होकर भागने लगे और सेना में भगदड़ मच गई। इसके बाद भगवान विष्णु ने शारंग धनुष उठाया और उनके दिव्य बाण राक्षसों का संहार करने लगे। रणभूमि रक्त से भर उठी। गरुड़ भी अपने विशाल पंखों से राक्षसों को दूर-दूर तक उड़ा रहे थे।

अपनी सेना को टूटता देख माली स्वयं युद्धभूमि में उतरा। उसने भगवान विष्णु और गरुड़ पर तीव्र बाणों की वर्षा की। कुछ समय के लिए गरुड़ विचलित हुए, किंतु यह दृश्य देखकर भगवान विष्णु का रौद्र रूप प्रकट हुआ। उन्होंने अपनी उंगली पर सुदर्शन चक्र धारण किया। सूर्य के समान प्रज्वलित वह चक्र बिजली की गति से माली की ओर बढ़ा और अगले ही क्षण उसका मस्तक धड़ से अलग कर दिया। माली का विशाल शरीर पृथ्वी पर गिरा तो पूरी रणभूमि कांप उठी। यह देखकर राक्षस सेना का साहस टूट गया।

माल्यवान और सुमाली भयभीत होकर भागने लगे। भगवान विष्णु उनका पीछा करते हुए आगे बढ़े। तभी माल्यवान पीछे मुड़ा और बोला, "हे विष्णु! भागते हुए शत्रु पर प्रहार करना क्षत्रिय धर्म नहीं है। यदि युद्ध करना है तो मेरे सामने आइए।" भगवान विष्णु ने शांत स्वर में उत्तर दिया, "देवताओं की रक्षा मेरा परम धर्म है। मैंने उन्हें वचन दिया है कि तुम्हारे आतंक का अंत करूंगा। चाहे तुम रसातल में ही क्यों न छिप जाओ, मैं तुम्हें छोड़ूंगा नहीं।" यह सुनकर माल्यवान ने क्रोध में अपना दिव्य अस्त्र चलाया, किंतु भगवान विष्णु ने उसे पलभर में नष्ट कर दिया। फिर दोनों के बीच भयंकर युद्ध हुआ। अंततः भगवान विष्णु के एक प्रचंड बाण से माल्यवान गंभीर रूप से घायल होकर भूमि पर गिर पड़ा। जब उसे होश आया तो वह समझ चुका था कि भगवान विष्णु को पराजित करना असंभव है।

माली के वध और माल्यवान की पराजय के बाद सुमाली सहित समस्त राक्षस भयभीत होकर अपनी पत्नियों और संतानों को लेकर रसातल की ओर भाग गए। स्वर्णमयी लंका एक बार फिर वीरान हो गई। राक्षसों का अभिमान धूल में मिल चुका था और धर्म की विजय हुई। किंतु यही अंत नहीं था। रसातल में छिपे सुमाली ने भविष्य में एक नया षड्यंत्र रचा। उसने अपनी पुत्री कैकसी का विवाह महर्षि विश्रवा से कराया और उसी वंश में आगे चलकर जन्म हुआ उस महाबली रावण का, जिसने फिर एक बार तीनों लोकों को चुनौती दी। इस प्रकार राक्षसों का इतिहास समाप्त नहीं हुआ, बल्कि एक नए अध्याय की शुरुआत हुई, जिसने आगे चलकर रामायण की महान कथा को जन्म दिया।〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️🌼〰️〰️
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