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सारा ब्रह्मांड गूँज रहा, बम-बम भोले के उद्घोष से

सारा ब्रह्मांड गूँज रहा, बम-बम भोले के उद्घोष से

कुमार महेंद्र
जटाओं में गंगा विराजे,
भाल विराजित चंद्र निराला।
नीलकंठ में नाग सुशोभित,
त्रिनयन में प्रचंड उजाला।
डमरू की धुन दिशि-दिशि गूँजे,
मन पुलकित हो शिव के घोष से।
सारा ब्रह्मांड गूँज रहा,बम-बम भोले के उद्घोष से।।


भस्म-विभूषित तन मनभावन,
कैलाश के नाथ कहलाएं।
दीन-दुखी के परम सहारे,
जो भी आए, गले लगाएँ।
करुणा जिनकी सीमा-रहित है,
दुःख मिटता उनके संतोष से।
सारा ब्रह्मांड गूँज रहा,बम-बम भोले के उद्घोष से।।


अनादि, अनंत, महादेव हैं,
देवों के भी देव कहलाते।
तीनों लोकों के स्वामी शिव,
भक्तों के संकट हर जाते।
काम-विकारों के संहारक,
मन निर्मल हो उनके परितोष से।
सारा ब्रह्मांड गूँज रहा,बम-बम भोले के उद्घोष से।।


पार्वती के प्राण-प्यारे,
गणपति-कार्तिक संग सुशोभित।
नंदी के संग भक्त खड़े हैं,
शिव-दर्शन को लालायित।
कैलाश से कृपा बरसती,
जीवन भरता नव-ओज से।
सारा ब्रह्मांड गूँज रहा,बम-बम भोले के उद्घोष से।।


सावन की रिमझिम फुहारें,
शिवालय में दीप जलाएँ।
बेलपत्र और गंगाजल से,
भोलेनाथ को आज रिझाएँ।
हर-हर महादेव की ध्वनि से,
जीवन मुक्त हो कष्ट-पीड़ा-दोष से।
सारा ब्रह्मांड गूँज रहा,बम-बम भोले के उद्घोष से।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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