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संस्कृत की उपेक्षा से शिक्षा का मूल उद्देश्य हो रहा नष्ट : डॉ. विवेकानंद मिश्र

संस्कृत की उपेक्षा से शिक्षा का मूल उद्देश्य हो रहा नष्ट : डॉ. विवेकानंद मिश्र

  • विश्व संस्कृत दिवस पर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा और संस्कृत भाषा के संरक्षण-संवर्धन का लिया गया संकल्प
गया। गया जी की पावन एवं पुण्यभूमि में डॉक्टर विवेकानंद पथ स्थित डॉ. विवेकानंद मिश्र के आवास पर विश्व संस्कृत दिवस के अवसर पर भारतीय संस्कृति, सनातन परंपरा तथा संस्कृत भाषा के संरक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से एक गरिमामयी सभा का आयोजन किया गया। भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में देश और समाज के अनेक विद्वान, आचार्य, समाजसेवी, शिक्षाविद, अधिवक्ता एवं गणमान्य नागरिक प्रत्यक्ष एवं आभासी माध्यम से शामिल हुए।

समारोह को संबोधित करते हुए भारतीय राष्ट्रीय ब्राह्मण महासभा एवं कौटिल्य मंच के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विवेकानंद मिश्र ने कहा कि संस्कृत केवल एक भाषा नहीं, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा की मूल आधारशिला है। संस्कृत की पूर्ण उपेक्षा के कारण आज शिक्षा अपने मूल उद्देश्य से भटकती जा रही है।

उन्होंने कहा कि भारत के वेद, उपनिषद, पुराण, दर्शन, आयुर्वेद, ज्योतिष सहित असंख्य शास्त्रीय एवं ज्ञानपरक ग्रंथों की मूल भाषा संस्कृत रही है। भारतीय चिंतन, अध्यात्म, दर्शन और संस्कृति को हजारों वर्षों तक संस्कृत ने अभिव्यक्ति और दिशा प्रदान की है। इसलिए संस्कृत दिवस केवल किसी भाषा का उत्सव नहीं, बल्कि अपनी गौरवशाली ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक विरासत के पुनर्स्मरण का अवसर है।

डॉ. मिश्र ने संस्कृत को वेद और विज्ञान की जननी बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद पूंजीवादी और उपभोक्तावादी दृष्टिकोण के प्रभाव में समाज आधुनिकता की ऐसी अंधी दौड़ में शामिल हो गया, जिसमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों और जीवन मूल्यों से दूरी बढ़ती गई। आधुनिक शिक्षा में भी इसका प्रभाव दिखाई दे रहा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार प्राप्त करना नहीं, बल्कि व्यक्ति में विवेक, संस्कार, संवेदना, कर्तव्यबोध और समाज के प्रति उत्तरदायित्व पैदा करना भी है। संस्कृत और भारतीय ज्ञान परंपरा की उपेक्षा से शिक्षा के इस व्यापक उद्देश्य को नुकसान पहुंच रहा है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत के संरक्षण का अर्थ किसी प्राचीन भाषा को केवल सुरक्षित रखना नहीं है, बल्कि भारतीय ज्ञान परंपरा, संस्कार, जीवन-मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना को जीवित रखना है। हमारे पूर्वजों ने 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' की जो कल्पना की थी, वह केवल कोई श्लोक या नारा नहीं था, बल्कि सामाजिक व्यवहार और मानवीय जीवन का आधार हुआ करता था। आज आवश्यकता है कि उस मानवीय दृष्टिकोण को पुनः समाज के जीवन में स्थापित किया जाए।

डॉ. मिश्र ने नई पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने के लिए विद्यालयों, महाविद्यालयों और सामाजिक संस्थाओं को आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल धार्मिक अनुष्ठानों, पूजा-पाठ अथवा प्राचीन ग्रंथों तक सीमित रखने के बजाय आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीक और युवा पीढ़ी के बीच प्रतिष्ठित करना होगा।

संस्कृत भारतीय मनीषा की अमूल्य धरोहर : आचार्य सच्चिदानंद मिश्र


समारोह में आचार्य सच्चिदानंद मिश्र 'नैकी' ने संस्कृत की वैज्ञानिकता, शास्त्रीय गरिमा और भारतीय जीवन में उसके व्यापक प्रभाव पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि संस्कृत भारतीय मनीषा की ऐसी अमूल्य धरोहर है, जिसके माध्यम से ज्ञान, दर्शन और अध्यात्म की विशाल परंपरा पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रवाहित होती रही है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत का अध्ययन केवल परीक्षा उत्तीर्ण करने अथवा शैक्षणिक विषय तक सीमित नहीं होना चाहिए। इसे आत्मबोध, चिंतन, संस्कार और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ने की आवश्यकता है। संस्कृत के माध्यम से युवा भारत के प्राचीन ज्ञान और चिंतन की गहराई को समझ सकते हैं।

युवाओं को संस्कृत से जोड़ने की आवश्यकता : पं. राधा मोहन मिश्र


पंडित राधा मोहन मिश्र 'माधव' ने कहा कि संस्कृत भाषा के प्रति समाज में जागरूकता उत्पन्न करना आज समय की आवश्यकता है। युवाओं को संस्कृत के अध्ययन के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए। उन्होंने संस्कृत को भारतीय संस्कारों और ज्ञान परंपरा से जोड़ने वाली महत्वपूर्ण कड़ी बताते हुए कहा कि इसके संरक्षण और संवर्धन में समाज की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।

संस्कृत को आधुनिक शिक्षा से जोड़ना होगा : राकेश दत्त मिश्र


सभा में भाग लेते हुए भारतीय जन क्रांति दल के राष्ट्रीय महासचिव राकेश दत्त मिश्र ने कहा कि देश के जागरूक नागरिकों, राष्ट्रभक्तों और विद्वज्जनों को संस्कृत भाषा के प्रचार-प्रसार, अध्ययन-अध्यापन और संरक्षण के विषय पर गंभीर मंथन करना चाहिए।

उन्होंने कहा कि संस्कृत को केवल ग्रंथों और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित रखने की प्रवृत्ति को बदलना होगा। संस्कृत को आधुनिक शिक्षा, शोध, तकनीकी अध्ययन और युवा पीढ़ी के साथ जोड़ने के लिए व्यापक अभियान चलाने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि यदि समाज अपनी भाषा, संस्कृति और ज्ञान परंपरा से कट जाता है तो विकास की प्रक्रिया अधूरी रह जाती है। आधुनिकता और परंपरा के बीच संतुलन स्थापित करते हुए संस्कृत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना समय की मांग है।

संस्कृत दिवस भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान का प्रतीक : चरण बाबू डालमिया


समाजसेवी एवं प्रसिद्ध व्यवसायी श्री चरण बाबू डालमिया ने कहा कि संस्कृत दिवस के अवसर पर आयोजित यह सभा भारतीय ज्ञान परंपरा के प्रति सम्मान और संस्कृत भाषा के प्रति जागरूकता का सार्थक प्रतीक बने, यही उनकी कामना है। उन्होंने कहा कि संस्कृत के संरक्षण के लिए सामाजिक स्तर पर निरंतर प्रयास किए जाने चाहिए।
संस्कृत संरक्षण के लिए संकल्प लेने का आह्वान

पंडित बालमुकुंद मिश्र ने सभा में उपस्थित लोगों से संस्कृत के अध्ययन, संरक्षण और संवर्धन के लिए निरंतर प्रयास करने का संकल्प लेने का आग्रह किया। उन्होंने कहा कि केवल संस्कृत दिवस मनाने से उद्देश्य पूरा नहीं होगा, बल्कि पूरे वर्ष संस्कृत के प्रचार-प्रसार के लिए कार्यक्रम आयोजित करने होंगे।

डॉ. ज्ञानेश भारद्वाज ने कहा कि संस्कृत हमारी संस्कृति की वाणी, ज्ञान परंपरा की धरोहर और भारतीय मनीषा की अमूल्य निधि है। संस्कृत का संरक्षण केवल अतीत को सुरक्षित रखने का कार्य नहीं है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनकी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने का दायित्व भी है।

समाज को जागृत करने का अवसर है संस्कृत दिवस : डिंपल कुमारी

समारोह के अंत में भारतीय जन क्रांति दल की वरिष्ठ सदस्य एवं समाजसेवी डिंपल कुमारी ने सभी उपस्थित अतिथियों एवं प्रतिभागियों के प्रति आभार व्यक्त किया। उन्होंने संस्कृत दिवस की आवश्यकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह दिवस समाज को अपनी संस्कृति, भाषा और ज्ञान परंपरा के प्रति जागरूक करने का पावन अवसर है। उन्होंने संस्कृत के संरक्षण के लिए सामूहिक प्रयास की आवश्यकता पर बल दिया।
संस्कृत को सरकारी प्रयासों तक सीमित नहीं रखा जा सकता : वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया

वरिष्ठ अधिवक्ता याहिया ने कहा कि भारतीय संस्कृति को जीवंत बनाने वाली अति प्राचीन भाषा संस्कृत को केवल सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। इसके लिए समाज के प्रत्येक वर्ग को आगे आना होगा। उन्होंने कहा कि सार्वजनिक जीवन में संस्कृत के प्रयोग और प्रचार-प्रसार के साथ आम लोगों में इसके प्रति जागरूकता पैदा करना आवश्यक है।

उन्होंने कहा कि संस्कृत को जनजीवन से जोड़ने के लिए विद्यालयों, सामाजिक संगठनों, धार्मिक संस्थाओं और बुद्धिजीवियों को मिलकर प्रयास करना चाहिए।

बड़ी संख्या में विद्वान एवं गणमान्य लोग रहे उपस्थित

समारोह में बड़ी संख्या में विद्वान, आचार्य, समाजसेवी एवं गणमान्य लोग उपस्थित रहे। प्रमुख रूप से राजीव नयन पाण्डेय, स्वामी सुमन गिरी, अरुण मिश्रा मधुप, प्रचंड बाबा, आचार्य अभय पाठक, हरि नारायण त्रिपाठी, संदीप मिश्र, रूबी कुमारी, महेश मिश्रा, डॉ. विनोद कुमार मिश्रा, आनंद कुमार, मुन्ना जी, उत्तम पाठक, मनीष मिश्रा, नीलम कुमारी, आचार्य सुनील पाठक, अमरनाथ मिश्र, डॉ. रविंद्र कुमार, रंजीत पाठक, पवन मिश्रा, किरण पाठक, सुनीता देवी, ममता देवी, शंभू मिश्रा, अच्युत अनंत मराठे, कविता रावत, इंद्रदेव मांझी, करईल मांझी, सुमो चक्रवर्ती, विश्वजीत चक्रवर्ती, अरुण ओझा, चंद्रभूषण मिश्रा, रजनी चावला, पुष्पा देवी, रश्मि पांडे, रंजना, अर्चना कुमारी, गिरीश मिश्रा, गोपाल प्रसाद, पिंकी, जितेंद्र मिश्र, अजय मिश्रा, दीपक पाठक, मनीष कुमार, सुनील कुमार, सोनी कुमारी, जितेंद्र ठाकुर, प्रोफेसर सुनील कुमार मिश्र, नुसरत परवीन, डॉ. जितेंद्र कुमार मिश्र, राखी कुमारी, अशोक दूबे, हरिद्वार मिश्र, दीपक कुमार शर्मा, शीला त्रिपाठी, राजेश त्रिपाठी, सुनीला देवी, संतोष पाठक, गौरव कुमार, विभाष चंद्र मिश्रा, रश्मि मिश्रा, शिव शंकर प्रसाद, राम लखन सिंह, राम केवल सिंह, गौरव कुमार, रामाशंकर मिश्र, सुनील कुमार, रणजीत मिश्रा, नीरज कुमार वर्मा, सुमन कुमारी, कुंदन मिश्र, दिलीप कुमार, शीतल, पुष्पलता चौबे, शंभू गिरी, प्यारी देवी, अमित देवी, पवन कुमार, गिरिजा देवी, शिव जी, ऋतिक कुमार, सत्यम कुमार, पवन पाठक, शंभू लाल गुर्दा, जसीम अहमद, राजीव किशोर एवं गणेश मिश्रा सहित अनेक लोग शामिल रहे।

समारोह के दौरान वक्ताओं ने एक स्वर में संस्कृत के संरक्षण और संवर्धन के लिए सामाजिक जागरूकता अभियान चलाने, नई पीढ़ी को संस्कृत से जोड़ने तथा भारतीय ज्ञान परंपरा को आधुनिक शिक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर बल दिया। समारोह का संदेश यही रहा कि संस्कृत का संरक्षण केवल एक भाषा का संरक्षण नहीं, बल्कि भारत की सांस्कृतिक चेतना, ज्ञान-विज्ञान और जीवन मूल्यों के संरक्षण का अभियान है।

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