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चीनी भी लगने लगी अब चीनी


कभी चाय की मिठास और त्योहारों की रौनक बढ़ाने वाली चीनी, आज बढ़ते दामों के कारण आम आदमी के बजट पर बोझ बनती जा रही है।
इसी बदलते अनुभव और बढ़ती महँगाई ने इन पंक्तियों को जन्म दिया।
जब मिठास भी बजट बिगाड़ने लगे,
तो समझिए महँगाई सचमुच बहुत कुछ बदल चुकी है।
इस समसामयिक बिंदु पर कुछ पंक्तियां सादर निवेदित हैं 🙏

चीनी भी लगने लगी अब चीनी

कुमार महेंद्र
रसोई का बजट डगमगाया,
महँगाई ने रंग उड़ाया।
दूध-चाय तक हुई परेशानी,
फीकी पड़ने लगी जिंदगानी।
कल तक अपनी लगती थी जो,
आज वही लगती अनजानी।
चीनी भी लगने लगी अब चीनी।।


मेहमानों की मीठी खातिर,
चीनी रहती थी घर-घर में।
चाय की प्याली, दूध के संग,
मिठास घुलती थी जीवन में।
दाम बढ़े तो सोच में डूबी,
मध्यमवर्गीय हर जिंदगानी।
चीनी भी लगने लगी अब चीनी।।


त्योहारों की मिठास कहाँ अब,
मिष्ठानों की फीकी रवानी।
बढ़ते भावों ने छीन लिया है,
घर-आँगन की हँसी पुरानी।
अपनी-सी थी जो कभी हमें,
क्यों लगने लगी आज बेगानी।
चीनी भी लगने लगी अब चीनी।।


जनता पूछ रही है आखिर,
कब थमेगी यह मनमानी?
दामों की यह चढ़ती सीढ़ी,
कब देगी फिर कुछ मेहरबानी?
शक्कर की कीमत बढ़ते-बढ़ते,
मिठास हुई बीती कहानी।
चीनी भी लगने लगी अब चीनी।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)

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