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“सांस्कृतिक बिहार पूर्णग्रहण में, मोक्षकाल पता नहीं”

“सांस्कृतिक बिहार पूर्णग्रहण में, मोक्षकाल पता नहीं”

- हृदय नारायण झा

15 अगस्त 2026 पर योग दृष्टि

  • बिहार में दबा-कुचला है सांस्कृतिक बिहार,तीन विभागों में बिहार की सम्पूर्ण धार्मिक, आध्यात्मिक, लोक-सांस्कृतिक एवं भाषा-सांस्कृतिक चेतना दफन
पटना। आज 15 अगस्त 2026 को जब सम्पूर्ण राष्ट्र स्वतंत्रता दिवस का जश्न मना रहा था, उस समय मेरे मनोभाव में आजादी के दीवानों की स्मृति, तिरंगे के प्रति सम्मान, प्रजातांत्रिक भारतीय शासन व्यवस्था की रक्षा का भाव तथा आजादी के मूल्यों के प्रति संकल्प, तत्परता और समर्पण जैसी भावनाएं अपेक्षित रूप में दिखाई नहीं दीं।
जो दिखाई दिया, उसकी सार्थकता शायद केवल इतनी ही सिद्ध होगी कि हमने तिरंगा फहराकर देशभक्ति का भाव अर्पित कर दिया।

आजादी की लड़ाई के महानायक महात्मा गांधी के प्रति सम्मान का प्रदर्शन तो दिखाई देता है, लेकिन लोकतांत्रिक मूल्यों के लिए गांधी जी द्वारा बताए गए एकादश व्रत और उनके आदर्शों को सार्वजनिक जीवन से जोड़ने की चर्चा कितनी होती है, यह विचारणीय प्रश्न है। गांधी जी के चश्मे को स्वच्छता अभियान का प्रतीक बनाना अच्छी बात है, लेकिन उनके विचारों और मूल्यों को सत्ता, राजनीति और सार्वजनिक जीवन में उतारना उससे कहीं अधिक आवश्यक है।

नेताओं, सांसदों और केंद्रीय मंत्रिमंडल के सदस्यों को भी गांधी जी के मूल्यों और एकादश व्रतों से जोड़ने की आवश्यकता है। लेकिन ऐसा लगता है कि सत्ता के संचालन में लगे लोगों का ध्यान इस ओर अपेक्षित रूप से नहीं है।

इसका प्रभाव बिहार पर भी दिखाई देता है।
दबा-कुचला है सांस्कृतिक बिहार

सरकार के स्तर पर गौरवशाली बिहार की आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपरा के प्रति अपेक्षित जागरूकता के अभाव में आज सांस्कृतिक बिहार दबा-कुचला हुआ दिखाई देता है।

वर्तमान में विभाजित और उपेक्षित सांस्कृतिक बिहार की धार्मिक, सांस्कृतिक एवं शैक्षणिक विरासत अत्यंत दुर्बल अवस्था में पहुंच चुकी है। अनेक परंपराएं संरक्षण और संवर्धन के अभाव में धीरे-धीरे विलुप्ति की ओर बढ़ रही हैं।

बिहार की धार्मिक, लोक-सांस्कृतिक और भाषा-सांस्कृतिक चेतना मुख्यतः तीन सरकारी विभागों के दायरे में दिखाई देती है—विधि विभाग, कला एवं संस्कृति विभाग तथा शिक्षा विभाग। इन तीनों के बीच समन्वित प्रयास के अभाव का असर बिहार की सांस्कृतिक विरासत पर पड़ रहा है।
विधि विभाग और धार्मिक विरासत

विधि विभाग के अंतर्गत संचालित बिहार राज्य धार्मिक न्यास पर्षद के अधीन राज्य के अनेक मठ-मंदिर और धार्मिक संस्थान आते हैं।

धार्मिक विरासत के संरक्षण, मठ-मंदिरों के सुचारु संचालन और धर्मोत्थान से जुड़े विषयों पर गंभीर और दीर्घकालिक दृष्टि की आवश्यकता है। मठ-मंदिरों से संबंधित विवाद भी एक बड़ी समस्या हैं। इन विषयों के समाधान तथा धार्मिक विरासत के संरक्षण के लिए प्रभावी व्यवस्था आवश्यक है।

धर्म क्षेत्र से जुड़े साधक, उपासक, परंपरावादी विद्वान और जानकार लोगों की सहभागिता के बिना धार्मिक विरासत के संरक्षण की प्रक्रिया अधूरी रह सकती है।
कला एवं संस्कृति विभाग की जिम्मेदारी

कला एवं संस्कृति विभाग बिहार की व्यापक कला और सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण विभाग है।

लेकिन बिहार की सांस्कृतिक विविधता इतनी व्यापक है कि इसके लिए समेकित और दीर्घकालिक योजना की आवश्यकता है।

मैथिली, भोजपुरी, मगही, अंगिका, बज्जिका, खोरठा, सुरजापुरी सहित बिहार और इसके विभिन्न क्षेत्रों की भाषायी एवं लोक-सांस्कृतिक परंपराओं को संरक्षण की आवश्यकता है।

विशेष रूप से लोकजीवन से जुड़े गीत, संगीत, नृत्य, नाट्य, लोकगाथा और पारंपरिक कलाओं की अनेक विधाएं विलुप्ति के कगार पर हैं। इनके संरक्षण, दस्तावेजीकरण, प्रशिक्षण और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण के लिए समेकित योजना जरूरी है।
शिक्षा विभाग और भाषायी अकादमियां

बिहार की भाषायी अकादमियां उच्च शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत आती हैं। इन अकादमियों की जिम्मेदारी केवल साहित्यिक गतिविधियों तक सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि उन्हें बिहार की भाषायी और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक संदर्भ में पुनर्स्थापित करने का माध्यम बनना चाहिए।

बिहार की वैदिक, पौराणिक, दार्शनिक, राजनीतिक और शैक्षणिक परंपराओं का इतिहास अत्यंत समृद्ध रहा है। इन्हें आधुनिक शोध, शिक्षा और नई पीढ़ी के संदर्भ से जोड़ने की आवश्यकता है।

लेकिन यदि भाषायी अकादमियां ही कमजोर पड़ जाएं और उनके अस्तित्व पर संकट खड़ा हो जाए तो बिहार की गौरवशाली भाषा-सांस्कृतिक विरासत को वर्तमान पीढ़ी तक पहुंचाने का माध्यम कौन बनेगा?

विशेष रूप से Gen-Z के सामने बिहार की प्राचीन ज्ञान परंपरा, साहित्य, दर्शन और सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक भाषा और तकनीक के माध्यम से प्रस्तुत करने की आवश्यकता है।
तीन विभाग मिलकर करें प्रयास

यदि विधि विभाग, कला एवं संस्कृति विभाग तथा शिक्षा विभाग समन्वित रूप से काम करें तो आज भी बिहार की सांस्कृतिक विरासत के पुनर्जागरण की पूरी संभावना है।

मठ-मंदिरों की धार्मिक परंपराएं, लोककलाएं, लोकगीत, नृत्य, संगीत, भाषाएं, साहित्य, ज्ञान परंपराएं और ऐतिहासिक विरासत—इन सबको एक समग्र सांस्कृतिक नीति के तहत जोड़ने की आवश्यकता है।

गौरवशाली सांस्कृतिक बिहार का दर्शन वर्तमान पीढ़ी के बीच कराने वाली कोई दूसरी प्रभावी व्यवस्था नहीं है। इसलिए सरकार को इस विषय को केवल समारोहों तक सीमित न रखकर नीति और कार्ययोजना का विषय बनाना चाहिए।
बिहार की भाषा-संस्कृति दुनिया को क्या देती है?

बिहार की भाषा-सांस्कृतिक विरासत केवल बिहार की संपत्ति नहीं है। यह भारतीय सभ्यता और विश्व की सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा है।

बिहार की धरती ने मानवता, ज्ञान, दर्शन, लोकतांत्रिक चेतना और सामाजिक समरसता की अनेक धाराओं को जन्म दिया और पोषित किया।

मगध और वैशाली के लिच्छवी गणराज्य की परंपराएं भारतीय लोकतांत्रिक इतिहास की महत्वपूर्ण विरासत हैं। भगवान बुद्ध के समय की सामाजिक और वैचारिक परंपराएं आज भी अध्ययन और अनुसंधान का विषय हैं।

ऐसी विरासत को नई पीढ़ी से जोड़ना हमारी जिम्मेदारी है।
सांस्कृतिक बिहार पर पूर्णग्रहण

आज सांस्कृतिक बिहार के इस संकट से केवल कलाकार, साहित्यकार या विद्वान ही प्रभावित नहीं हैं।

इसका प्रभाव मठ-मंदिरों के महंतों, पुजारियों, सेवायतों, विभिन्न पंथों की परंपराओं, लोकगीतों और लोकनृत्य के कलाकारों, पारंपरिक संगीत घरानों, लोकगाथा के संवाहकों, विद्वानों, शोधकर्ताओं, कवियों, कलाकारों और नवोदित प्रतिभाओं पर भी पड़ रहा है।

बिहार की प्रथम ज्ञान परंपराओं, प्राचीन शिक्षा पद्धतियों, साहित्यिक विरासत, दर्शन, अर्थशास्त्र, खगोल विज्ञान और अन्य ज्ञान-विधाओं से जुड़ी विरासतों के संरक्षण एवं संवर्धन के लिए भाषायी अकादमियों और उच्च शिक्षा व्यवस्था को अधिक सक्रिय होना होगा।

अन्यथा हमारी प्राचीन उपलब्धियां केवल इतिहास की पुस्तकों में सिमटकर रह जाएंगी।
आजादी का जश्न और सांस्कृतिक आजादी

15 अगस्त हमें केवल राजनीतिक स्वतंत्रता का स्मरण नहीं कराता, बल्कि यह भी पूछता है कि क्या हमारी भाषा, संस्कृति, ज्ञान परंपरा और सांस्कृतिक चेतना स्वतंत्र एवं जीवंत है?

यदि हमारी सांस्कृतिक संस्थाएं कमजोर होती जाएं, भाषायी अकादमियां निष्क्रिय होती जाएं, लोककलाएं विलुप्त होती जाएं और हमारी नई पीढ़ी अपनी सांस्कृतिक जड़ों से कटती जाए, तो हमें इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करना होगा।

सांस्कृतिक बिहार आज पूर्णग्रहण में है। उसका मोक्षकाल कब आएगा—यह प्रश्न केवल सरकार से नहीं, समाज और विपक्ष से भी है।

ऐसी चिंतनधारा के बीच आखिर आजादी का जश्न कैसा?

— हृदय नारायण झा
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