उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है

उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है

कुमार महेंद्र
सिर्फ शीर्ष पर लहराना ही,
सच्चा ध्वज-वंदन कहाँ?
दिखावे की इस अंधी होड़ में,
राष्ट्र-गौरव का अभिनंदन कहाँ?
त्रुटि को जो तमाशा बनाकर,
करता उसका ही गुणगान है।
उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है।।


व्यूज-लाइक्स की क्षुद्र पिपासा,
कैसा यह उन्माद हुआ?
राष्ट्रध्वज के पावन गौरव पर,
क्यों इतना विवाद हुआ?
अपनी ही कमजोरी दिखलाकर,
जो करता उसका बखान है।
उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है।।


ध्वज-मर्यादा की पावन सीमा,
तनिक समझनी होगी अब।
कैमरे की इस ओछी ज़िद से,
दृष्टि बदलनी होगी अब।
यदि विपर्यय दिख जाए कहीं तो,
सुधार ही देशभक्ति की पहचान है।
उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है।।


ध्वज नहीं केवल वस्त्र का टुकड़ा,
यह भारत की शान है।
शहीदों के पावन रक्तों से,
रंजित इसका मान है।
दोषों की प्रदर्शनी छोड़कर,
इसकी रक्षा ही सम्मान है।
उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है।।


आओ ध्वज की आन बचाएँ,
इसकी गरिमा का ध्यान करें।
जहाँ कहीं भी त्रुटि दिखे तो,
मिलकर उसका निदान करें।
मातृभूमि के पावन ध्वज पर,
अर्पित हर श्वास-प्राण है।
उल्टे फहराए तिरंगे का, प्रचार भी अपमान है।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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