तू वसुधा का मानस-हृदय, तू मनुष्यता का मन-प्राण !

- साहित्य सम्मेलन में आयोजित हुई राष्ट्रीय-गीत-गोष्ठी, कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान को किया नमन
पटना, १६ अगस्त। "तू वसुधा का मानस हृदय/ तू मनुष्यता का मन-प्राण / तुम सृष्टि-कर्ता की अमर-कृति / तू माँ मेरी भारत महान! ऐ माँ ! तुझ पर हम सब क़ुर्बान!” ---- ख़ुशियाँ मनाओ लोगों पंद्रह अगस्त है आया/ हर शहर जगमगाया, हर गाँव मुस्कुराया!".jpeg)
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शनिवार को, राष्ट्रीय और देश-भक्ति की भावना से ओत-प्रोत ऐसी ही पंक्तियों से बिहार हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कण-कण गूँज रहा था। तालियों की गड़गड़ाहट और लहराते तिरंगे से श्रोतागण कवियों और कवयित्रियों को उत्साह दे रहे थे। भारत के ८०वें स्वतंत्रता-दिवस और 'झाँसी की रानी' की महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान की जयंती के अवसर पर, सम्मेलन सभागार में, राष्ट्रीय गीत गोष्ठी का आयोजन किया गया था।
चंदा मिश्र की राष्ट्र-वंदना से आरंभ हुई राष्ट्रीय गीत गोष्ठी में, कवि-पत्रकार हृदय नारायण झा के मधुर स्वर से पढ़े गए इस गीत को भी श्रोताओं ने मन से सुना कि " मेरी स्वतंत्रता तुझे नमन करूँ हज़ार/ अमर शहीद पुत्र तेरी माँ कहे पुकार/ रह-रह कर ये तिरंगा कर रही तुझे प्रणाम/ केसरिया तेरी एकता की शांति का निशान/ सादा है तेरी सादगी, सच्चाई का प्रमाण/ हरा रंग तेरे गाँव की हरियाली पर निसार।”
इरफ़ान अहमद बेलहारवी ने अपनी नज़्म पढ़ते हुए कहा- “सिंचा था इस चमन को शहीदों ने खून देकर, सीने पर गोली खाकर, सूली की भेंट चढ़ कर/ नारा सभी ने मिलकर बस एक था लगाया/ ख़ुशियाँ मनाओ लोगों! पंद्रह अगस्त है आया।
वरिष्ठ कवि डा रत्नेश्वर सिंह, बच्चा ठाकुर, आराधना प्रसाद, प्रो सुनील कुमार उपाध्याय, हृदय नारायण झा, डा पुष्पा जमुआर, डा पूनम आनन्द, विभारानी श्रीवास्तव, डा सुधा सिन्हा, सागरिका राय, शमा कौसर 'शमा', पूनम देवा, प्रियंवदा मिश्र, डा विद्या चौधरी, डा आशा रघुदेव,सुधा पाण्डेय, जय प्रकाश पुजारी, सिद्धेश्वर, नूतन सिन्हा, ईं अशोक कुमार, इरफ़ान अहमद बेलहारवी, डा प्रतिभा रानी, नमिता लोहानी, प्रियंका श्रीवास्तव 'शुभ्र', डा आर प्रवेश, बिन्देश्वर प्रसाद गुप्ता,इंदु भूषण सहाय, पंकज प्रियम, अर्जुन प्रसाद सिंह, सदानन्द प्रसाद, सुनीता रंजन, निकेश कुमार,दीपक प्रकाश गुप्त, अरविन्द कुमार 'अश्क़' आदि कवियों और कवयित्रियों ने अपनी रचनाओं का प्रभावशाली पाठ किए।
अपने अध्यक्षीय काव्य-पाठ में सम्मेलन अध्यक्ष डा अनिल सुलभ ने इन पंक्तियों से भारत-वंदना की कि - “तू वसुधा का मानस हृदय/ तू मनुष्यता का मन-प्राण/ तुम सृष्टि-कर्ता की अमर-कृति / तू माँ मेरी भारत महान! ऐ माँ ! तुझ पर हमसब क़ुर्बान! ऐ माँ ! तुझको शत-शत प्रणाम !”
समारोह का आरंभ राष्ट्रीय ध्वज के आरोहण के साथ हुआ। ध्वजारोहण के पश्चात उपस्थित साहित्य समाज को संबोधित करते हुए डा सुलभ ने कहा कि भारत की स्वतंत्रता में कवियों-साहित्यकारों का बलिदान और अवदान अन्य अमर बलिदानियों से कम न था। कवियों ने न केवल प्रेरणा के गीत गाकर देश को जगाया, अपितु स्वयं अपने श्रेष्ठतम बलिदान दिए। जेल की यातनाएँ सही और अनेकों कष्ट उठाए।
डा सुलभ ने कहा कि स्वतंत्रता-आंदोलन में कवियों ने ही नहीं, कवयित्रियों ने भी महान योगदान दिया, जिनमे, 'झाँसी की रानी' कविता लिखने वाली महान कवयित्री सुभद्रा कुमारी चौहान भी थी। जयंती पर उन्हें भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया गया। उन्होंने साहित्य समाज से प्रेरणा के गीत गाने की प्रार्थना की। मंच का संचालन सूर्य प्रकाश उपाध्याय ने तथा धन्यवाद-ज्ञापन कृष्ण रंजन सिंह ने किया।
इस अवसर पर वरिष्ठ लेखिका डा पूनम आनन्द ने सम्मेलन को, वयोवृद्ध कवियों के लिए एक चल कुर्सी भेंट की। बाँके बिहारी साव, डा मनोज गोवर्द्धनपुरी, प्रवीर कुमार पंकज, अरुण कुमार श्रीवास्तव, आनन्ददीप चौबे, दिवाकर भारतीय, डा कुंदन कुमार, सच्चिदानन्द शर्मा, भास्कर त्रिपाठी, पंकज कुमार, श्याम मनोहर मिश्र, रवि आनन्द, नरेश कुमार आदि बड़ी संख्या में प्रबुद्धजन उपस्थित थे।
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