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गांधी से प्रेरणा का प्रमाणपत्र: आखिर महात्मा गांधी का कौन-सा विचार नेताओं को पसंद है?

गांधी से प्रेरणा का प्रमाणपत्र: आखिर महात्मा गांधी का कौन-सा विचार नेताओं को पसंद है?

लेखक: डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारतीय राजनीति का एक अद्भुत रहस्य है। पंडित जवाहरलाल नेहरू से लेकर नरेंद्र मोदी तक, लगभग हर दौर के बड़े नेता किसी न किसी अवसर पर महात्मा गांधी का नाम श्रद्धा से लेते रहे हैं। कोई उन्हें राष्ट्रपिता कहता है, कोई उनके सत्य और अहिंसा को याद करता है, कोई उनके स्वच्छता अभियान को आगे बढ़ाने का दावा करता है और कोई उनके ग्राम स्वराज की चर्चा करता है।

लेकिन मेरे मन में वर्षों से एक मासूम-सा सवाल कुलबुला रहा है—

आखिर महात्मा गांधी के किस विचार से ये नेता वास्तव में प्रेरित हैं?

सत्य से?

तो फिर राजनीति में इतना असत्य क्यों?

अहिंसा से?

तो फिर भाषणों में विरोधियों के प्रति इतनी हिंसक भाषा क्यों?

सादगी से?

तो फिर सत्ता के आसपास इतना वैभव क्यों?

ग्राम स्वराज से?

तो फिर गांव आज भी शहरों की कृपा के मोहताज क्यों हैं?

स्वदेशी से?

तो फिर विदेशी वस्तुओं और विदेशी निवेश के प्रति इतना प्रेम क्यों?

ट्रस्टीशिप से?

तो फिर धन और सत्ता के गठजोड़ पर सवाल उठाना इतना असुविधाजनक क्यों हो जाता है?

शायद गांधीजी के विचारों में भी अब नेताओं ने ‘सेलेक्टिव प्रेरणा योजना’ लागू कर दी है।

जिस विचार से वोट मिले—उसे अपना लो।

जिस विचार से सत्ता मजबूत हो—उसे राष्ट्रहित बता दो।

और जिस विचार से असुविधा हो—उसे गांधीजी की पुरानी सोच कहकर संग्रहालय में रख दो!
गांधीजी सबके हैं, लेकिन गांधीजी के विचार किसके हैं?

महात्मा गांधी की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि वे केवल किसी पार्टी के नेता नहीं थे। वे सत्ता के आदमी नहीं थे। वे सत्ता को आईना दिखाने वाले व्यक्ति थे।

गांधीजी ने राजनीति को केवल चुनाव जीतने की तकनीक नहीं माना। उनके लिए राजनीति का अर्थ था—जनसेवा, नैतिकता, आत्मसंयम और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता।

आज की राजनीति में गांधीजी का चित्र दिखाई देता है।

उनकी मूर्तियां दिखाई देती हैं।

उनके नाम पर योजनाएं दिखाई देती हैं।

उनके जन्मदिन पर कार्यक्रम दिखाई देते हैं।

उनकी समाधि पर श्रद्धांजलि दिखाई देती है।

बस एक चीज ढूंढने पर भी दिखाई नहीं देती—

उनके विचारों का राजनीतिक आचरण।

गांधीजी की तस्वीर के सामने हाथ जोड़ना आसान है।

गांधीजी के सिद्धांतों के सामने अपना अहंकार झुकाना कठिन है।

और शायद यहीं से असली समस्या शुरू होती है।
नेहरू से मोदी तक—गांधी सबके प्रिय!

स्वतंत्र भारत की राजनीति में गांधीजी का नाम एक प्रकार का राजनीतिक ‘यूनिवर्सल पासवर्ड’ बन गया।

कांग्रेस ने गांधीजी को अपना वैचारिक आधार बताया।

समाजवादियों ने गांधीजी में गरीब और किसान देखा।

सर्वोदयी नेताओं ने गांधीजी में ग्राम स्वराज देखा।

भारतीय जनता पार्टी और उससे जुड़े राजनीतिक विमर्श में भी गांधीजी के स्वच्छता, स्वदेशी, आत्मनिर्भरता और जनकल्याण के विचारों का उल्लेख होता रहा है।

आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भी गांधीजी के स्वच्छता संबंधी विचारों को सार्वजनिक रूप से याद करते हैं।

अच्छी बात है।

लेकिन सवाल यह नहीं है कि गांधीजी का नाम कौन लेता है।

सवाल यह है कि—

गांधीजी की कौन-सी बात अपने जीवन और शासन में लागू करता है?

क्योंकि गांधीजी का विचार कोई ‘कोटेशन बैंक’ नहीं था कि अवसर देखकर कोई भी पसंदीदा पंक्ति निकाल ली और मंच पर पढ़ दी।

गांधीजी विचार थे।

गांधीजी प्रयोग थे।

गांधीजी आत्मपरीक्षण थे।

और सबसे बढ़कर—गांधीजी स्वयं को भी कठघरे में खड़ा करने का साहस थे।
सत्य—सबसे कठिन गांधी

गांधीजी के लिए सत्य केवल भाषण का विषय नहीं था। वह जीवन का आधार था।

आज नेता भी सत्य की बात करते हैं।

हर नेता कहता है—

“हम सत्य के साथ हैं।”

जनता सोचती है—बहुत अच्छी बात है।

फिर जनता पूछती है—

“सत्य कौन-सा?”

सरकार का?

विपक्ष का?

पार्टी का?

सोशल मीडिया का?

टीवी चैनल का?

या वह सत्य जिसे जनता अपनी आंखों से देख रही है?

यहीं से गांधीजी अचानक कठिन हो जाते हैं।

क्योंकि गांधीजी का सत्य केवल अपने पक्ष का सत्य नहीं था।

वह आत्मालोचन की मांग करता था।

गांधीजी का दर्शन कहता था कि पहले स्वयं को देखो।

हमारी राजनीति कहती है—

पहले सामने वाले की गलती खोजो।

गांधीजी कहते थे—
“मैं गलत हो सकता हूं।”

राजनीतिक दलों का आधुनिक संस्करण कहता है—

“हमसे गलती हो ही नहीं सकती; गलती हमेशा विपक्ष की होती है।”

गांधीजी अगर आज होते तो शायद सबसे पहले अपने ही अनुयायियों की बैठक बुलाते और पूछते—

“मेरे नाम की माला जपने वालों, मेरे सत्य का हिसाब कौन देगा?”
अहिंसा का अर्थ केवल लाठी न चलाना नहीं था

गांधीजी की अहिंसा को भी हमने सुविधानुसार छोटा कर दिया।

अहिंसा का मतलब केवल किसी को शारीरिक चोट न पहुंचाना नहीं था।

विचारों में हिंसा, भाषा में हिंसा, समाज को बांटने वाली घृणा, कमजोर को अपमानित करना—ये सब गांधीजी की दृष्टि में गंभीर प्रश्न थे।

आज सोशल मीडिया खोलिए।

एक राजनीतिक दल दूसरे को देशद्रोही बताता है।

दूसरा पहले को भ्रष्ट और निकम्मा बताता है।

तीसरा दोनों को सांप्रदायिक बताता है।

और जनता सोचती रहती है—

“गांधीजी की अहिंसा आखिर किस चैनल पर प्रसारित हो रही है?”

राजनीति में शब्दों की तलवारें चलती हैं और फिर मंच से गांधीजी को श्रद्धांजलि दी जाती है।

यह दृश्य कुछ वैसा ही है जैसे कोई व्यक्ति रोज मिठाई की दुकान पर जाकर मधुमेह पर भाषण दे।
ग्राम स्वराज: भाषण में गांव, बजट में शहर

गांधीजी भारत को गांवों का देश मानते थे।

उनकी कल्पना में गांव केवल वोट देने वाली इकाई नहीं था।

गांव आत्मनिर्भर हो।

स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो।

स्थानीय निर्णय स्थानीय लोग लें।

ग्राम पंचायतें मजबूत हों।

मनुष्य अपने पैरों पर खड़ा हो।

लेकिन हमारी राजनीति ने गांव को क्या बनाया?

चुनाव के समय ‘भारत का हृदय’ और चुनाव के बाद ‘विकास की प्रतीक्षा सूची’।

चुनाव आते ही गांव में नेता पहुंचते हैं।

कहते हैं—

“यह गांव मेरा परिवार है।”

चुनाव खत्म होते ही गांव का नागरिक सोचता है—

“परिवार का वह सदस्य कहां चला गया?”

गांधीजी ग्राम स्वराज चाहते थे।

हमने गांव को ‘सरकारी योजना का लाभार्थी’ बना दिया।

गांधीजी चाहते थे कि गांव निर्णय ले।

हमने गांव को आवेदन करने की आदत डाल दी।
स्वदेशी—सबसे असुविधाजनक गांधी

गांधीजी के स्वदेशी विचार को याद करना बहुत अच्छा लगता है।

जब तक खरीदारी शुरू न हो।

मोबाइल विदेशी।

कपड़ा विदेशी।

तकनीक विदेशी।

ऐप विदेशी।

सोशल मीडिया विदेशी।

और फिर मंच पर भाषण—

“हमें स्वदेशी अपनाना चाहिए।”

जनता पूछती है—

“साहब, पहले आप अपनाइए।”

नेता मुस्कुराते हैं।

तालियां बजती हैं।

कार्यक्रम समाप्त।

स्वदेशी फिर अगले भाषण तक स्थगित।

बेशक आधुनिक अर्थव्यवस्था गांधीजी के समय जैसी नहीं है। वैश्विक व्यापार आज वास्तविकता है। लेकिन गांधीजी के स्वदेशी का मूल प्रश्न आज भी प्रासंगिक है—

क्या हमारी आर्थिक नीतियां आम भारतीय की आत्मनिर्भरता बढ़ा रही हैं?

यही सवाल असली है।
ट्रस्टीशिप का क्या हुआ?

गांधीजी का ट्रस्टीशिप सिद्धांत कहता था कि संपत्ति रखने वाला व्यक्ति समाज के प्रति जिम्मेदार है।

आज हम इसे आधुनिक भाषा में ‘कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी’ कहकर काफी सभ्य बना सकते हैं।

लेकिन गांधीजी का सवाल उससे बड़ा था।

वे पूछते थे—

धन किसलिए?

संपत्ति किसलिए?

उद्योग किसलिए?

विकास किसके लिए?

और सबसे महत्वपूर्ण—

क्या अंतिम व्यक्ति तक उसका लाभ पहुंच रहा है?

आज आर्थिक विकास की ऊंची इमारतें खड़ी हो रही हैं।

लेकिन उसके नीचे दबे हुए व्यक्ति की आवाज सुनना गांधीवादी राजनीति की असली परीक्षा है।

गांधीजी का ‘अंत्योदय’ भाषण में बहुत सुंदर लगता है।

लेकिन गरीब की झोपड़ी में जाकर उसके जीवन की वास्तविकता देखना उतना सुंदर नहीं लगता।
गांधीजी की सबसे बड़ी बीमारी: वे सत्ता से डरते नहीं थे

शायद यही कारण है कि गांधीजी को याद करना आसान है, लेकिन उन्हें अपनाना कठिन।

गांधीजी सत्ता के सामने खड़े हो सकते थे।

वे अपने सहयोगियों से असहमति जता सकते थे।

वे जनता को भी गलत होने पर टोक सकते थे।

वे अपने विचारों की आलोचना सुन सकते थे।

वे स्वयं अपने जीवन पर प्रयोग करते थे।

आज की राजनीति में नेता से असहमति जताना कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे आपने संविधान की नहीं, पार्टी की अवमानना कर दी हो!

गांधीजी कहते थे—विचार महत्वपूर्ण है।

आधुनिक राजनीति कहती है—

पहले यह देखो कि विचार किस पार्टी का है।

अगर अपनी पार्टी का है तो महान।

विपक्ष का है तो राष्ट्रविरोधी!
गांधीजी को हमने ‘फोटो फ्रेम’ बना दिया

2 अक्टूबर आता है।

राजघाट पर श्रद्धांजलि होती है।

फूल चढ़ते हैं।

मालाएं चढ़ती हैं।

भाषण होते हैं।

टेलीविजन पर गांधीजी के चश्मे दिखाई देते हैं।

सोशल मीडिया पर गांधीजी के उद्धरण दिखाई देते हैं।

और फिर 3 अक्टूबर आते-आते सब सामान्य।

गांधीजी फिर दीवार पर टंगे चित्र बन जाते हैं।

शायद गांधीजी को आज सबसे ज्यादा दुख इस बात का होता कि—

जिस व्यक्ति ने जीवन भर सत्य को जीवित रखा, हमने उसे साल में एक दिन का सरकारी कार्यक्रम बना दिया।
गांधीजी से प्रेरणा या गांधीजी का राजनीतिक उपयोग?

यह प्रश्न कठोर है, लेकिन पूछा जाना चाहिए।

जब कोई नेता कहता है कि वह गांधीजी से प्रेरित है, तो जनता को भी पूछना चाहिए—

किस गांधी से?

स्वच्छता वाले गांधी से?

तो स्वच्छता रखिए।

सत्य वाले गांधी से?

तो सत्य बोलिए।

अहिंसा वाले गांधी से?

तो भाषा में भी अहिंसा लाइए।

स्वदेशी वाले गांधी से?

तो आर्थिक आत्मनिर्भरता पर गंभीरता से काम कीजिए।

ग्राम स्वराज वाले गांधी से?

तो गांवों को वास्तविक अधिकार दीजिए।

ट्रस्टीशिप वाले गांधी से?

तो आर्थिक शक्ति के साथ सामाजिक जिम्मेदारी भी स्वीकार कीजिए।

गरीब के गांधी से?

तो सबसे कमजोर व्यक्ति को विकास के केंद्र में रखिए।

और अगर इनमें से कोई भी बात स्वीकार नहीं करनी है तो कोई बात नहीं।

बस एक काम कीजिए—

गांधीजी का नाम लेना बंद कर दीजिए।

कम से कम गांधीजी पर इतना उपकार तो कीजिए!
गांधीजी शायद आज नेताओं से केवल एक प्रश्न पूछते

कल्पना कीजिए, गांधीजी आज संसद के बाहर खड़े हैं।

नेता आते हैं।

एक कहता है—

“बापू, हम आपके विचारों से प्रेरित हैं।”

दूसरा कहता है—

“बापू, हमने आपके सपनों का भारत बनाया है।”

तीसरा कहता है—

“बापू, हम आपके आदर्शों पर चल रहे हैं।”

गांधीजी शायद मुस्कुराकर पूछें—

“अच्छा! तो फिर मेरे कौन-से विचार पर चल रहे हो?”

सन्नाटा।

नेता एक-दूसरे का चेहरा देखने लगते हैं।

कोई कहेगा—स्वच्छता।

गांधीजी पूछेंगे—“और?”

कोई कहेगा—अहिंसा।

“और?”

कोई कहेगा—सत्य।

“और?”

फिर शायद सब मोबाइल निकालकर भाषण खोजने लगेंगे।

और गांधीजी चुपचाप अपनी लाठी उठाकर आगे बढ़ जाएंगे।

क्योंकि उन्हें पता होगा—

नाम मेरा है, लेकिन विचार किसी और के पास हैं।
अंतिम प्रश्न

महात्मा गांधी को मानना कठिन नहीं है।

उनकी तस्वीर लगाना आसान है।

उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाना आसान है।

उनका जन्मदिन मनाना आसान है।

उनका नाम भाषण में लेना आसान है।

उनके उद्धरण सोशल मीडिया पर डालना आसान है।

कठिन है तो गांधीजी के सत्य को अपने जीवन में उतारना।

कठिन है सत्ता के अहंकार को त्यागना।

कठिन है विरोधी को शत्रु न मानना।

कठिन है गरीब को केवल वोट बैंक न समझना।

कठिन है अपने समर्थकों को भी गलत कहने का साहस रखना।

कठिन है स्वयं से पूछना—

“क्या मैं वही कर रहा हूं जिसकी शिक्षा मैं दूसरों को दे रहा हूं?”

इसलिए अगली बार जब कोई नेता मंच से कहे—

“मैं महात्मा गांधी से प्रेरित हूं।”

तो तालियां बजाने से पहले जनता केवल एक छोटा-सा प्रश्न पूछे—
“बापू के किस विचार से?”

अगर उत्तर स्पष्ट है, तो शायद गांधीजी अभी जीवित हैं।

और अगर उत्तर नहीं है—

तो समझ लीजिए,

गांधीजी केवल भाषण में जीवित हैं,
विचारों में नहीं।

और यही हमारे लोकतंत्र का सबसे बड़ा व्यंग्य है—

जिस देश ने गांधी को जन्म दिया, वहां गांधी की तस्वीर सबके पास है;
लेकिन गांधी का आईना देखने का साहस कितनों के पास है?
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