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"आत्म ही अमृत"

"आत्म ही अमृत"

पंकज शर्मा
मस्तिष्क शांत, स्थिर मन,
शांत हुआ सब क्रंदन।
तृप्त हुआ चेतन-मन,
सधा स्व-अंतःस्पंदन।


स्वस्थ हुआ यह तन भी,
दूर व्याधि के क्षण भी।
संतोष की सरिता में,
भीगा-भीगा मन भी।


आशा की सब रेखाएँ,
जीवन की सब तृष्णाएँ।
हुईं स्वतः ही पूरित,
शांत हुईं लालसाएँ।


अंतर्मन का यह प्रकाश,
सच्चा सुख, सच्चा विश्वास।
तृप्ति-पथिक को मिला यहाँ,
परम तत्त्व का दिव्य वास।


यही औषधि, यही विराम,
यही शांति का अंतिम धाम।
आस-पास का जग भूले,
मिले आत्मा को विश्राम।


आत्म-संतुष्टि ही आधार,
जीवन का सुंदर श्रृंगार।
जिसने पाया यह वैभव,
वह तर गया भव-पार।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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