जीवन पथ पे बढ़ते रहो
निज जीवन तुम पढ़ते रहो ,जीवन पथ तुम बढ़ते रहो ।
कठिन वक्त से संघर्ष करके ,
नव पथ जीवन गढ़ते रहो ।।
वीर वही निज जीवन पढ़े ,
वीर वही जो नव पथ गढ़े ।
मुॅंह मोड़ना नहीं वक्त से तू ,
वीर वही नव शीर्ष चढ़े ।।
दृढ़ संकल्प का तू हार ले ,
संकल्प पे निज तू वार ले ।
वार तेरा कभी चुक न पाए ,
मन ही मन निज उद्गार ले ।।
मन ही मन निज उद्गार ले ,
मस्तिष्क पे निज भार ले ।
धैर्य तेरा कभी टुट न पाए ,
आत्मा को भी पुकार ले ।।
नव पथ अब गढ़ता चल ,
वक्त ही इतिहास लिखेगा ।
नव शीर्ष अब चढ़ता चल ,
तुझसे तेरा वक्त सीखेगा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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