प्रेम से पुकारो तो दौड़े चले आते हैं बांके बिहारी

- सच्ची भक्ति और निश्छल प्रेम की अद्भुत कथा
लेखक आनंद हठिला
वृंदावन की पावन धरती पर एक ऐसी भक्त महिला रहती थी, जिसका जीवन पूरी तरह भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में समर्पित था। वह लड्डू गोपाल को केवल भगवान नहीं, बल्कि अपने घर के छोटे से लल्ला और अपने परिवार के एक सदस्य के रूप में मानती थी। उसके लिए कान्हा ही उसके जीवन का आधार थे और उनकी सेवा ही उसके जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य।
वह प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर स्नान करती और उसके बाद बड़े प्रेम और श्रद्धा से अपने लड्डू गोपाल को स्नान कराती। उनके सुंदर वस्त्र बदलती, चंदन का तिलक लगाती और फिर जिस दिन घर में जो कुछ उपलब्ध होता, उसी को प्रेमपूर्वक भगवान को भोग लगाती। कभी फल, कभी मिश्री, कभी लड्डू तो कभी साधारण भोजन ही उनके लिए प्रेम का प्रसाद बन जाता।
उसकी भक्ति में वैभव नहीं था, लेकिन प्रेम की कोई कमी नहीं थी।
वह अपने लल्ला को भोग लगाए बिना स्वयं अन्न ग्रहण नहीं करती थी। शाम होते ही वह उनकी आरती करती और पूरे दिन अपने कान्हा का स्मरण करती रहती। उसके मन में हर क्षण केवल अपने लड्डू गोपाल का ही ध्यान रहता। उसके लिए जीवन का प्रत्येक क्षण कृष्णमय था।
एक दिन अचानक आने लगी तेज हिचकी
एक दिन सुबह से ही उस महिला को बहुत तेज हिचकी आने लगी। उसने बहुत प्रयास किया, लेकिन हिचकी रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी। वह काफी परेशान हो गई।
उसी समय अचानक उसकी बेटी अपनी मां से मिलने के लिए घर आ गई। बेटी के घर पहुंचते ही आश्चर्यजनक रूप से उसकी मां की हिचकी बंद हो गई।
बेटी ने अपनी मां का हालचाल पूछा तो मां ने कहा, "बेटी, वैसे तो मेरे लड्डू गोपाल की कृपा से सब ठीक है, लेकिन पता नहीं आज सुबह से मुझे इतनी तेज हिचकी आ रही थी कि रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी।"
यह सुनकर बेटी मुस्कुराई और बोली, "मां, आपकी हिचकी मेरी वजह से आ रही थी। आज सुबह से मैं आपको बहुत याद कर रही थी। शायद इसी वजह से आपको हिचकी आ रही थी और जैसे ही मैं आपके सामने आई, आपकी हिचकी बंद हो गई।"
मां ने आश्चर्य से पूछा, "क्या सच में ऐसा होता है?"
बेटी ने सहज भाव से कहा, "हां मां, ऐसा माना जाता है कि जब कोई व्यक्ति किसी को बहुत अधिक याद करता है, तो उसे हिचकी आने लगती है।"
भक्त मां के मन में उठी एक नई चिंता
बेटी की यह बात सुनते ही उस महिला के मन में एक अजीब-सी चिंता पैदा हो गई।
वह सोचने लगी—"मैं तो अपने लड्डू गोपाल को दिन-रात, हर पल और हर क्षण याद करती हूं। यदि किसी को याद करने से हिचकी आती है, तो मेरे छोटे से लल्ला को मेरी वजह से कितनी हिचकियां आती होंगी! मेरा लल्ला तो बार-बार हिचकी लेकर कितना परेशान होता होगा!"
यह विचार आते ही उसकी आंखों से आंसू बहने लगे।
वह अपने लड्डू गोपाल के सामने बैठकर रोते हुए कहने लगी—
"हे मेरे लल्ला! मुझे क्षमा कर दो। मैंने अनजाने में तुम्हें कितना कष्ट दिया होगा। मैं तो हर समय तुम्हें याद करती रहती हूं। मेरी वजह से मेरे छोटे से कान्हा को कितनी हिचकियां आती होंगी। हे प्रभु! मुझसे अनजाने में बहुत बड़ी गलती हो गई। मुझे क्षमा कर दो।"
वह बार-बार भगवान से क्षमा मांगने लगी।
फिर उसने मन में एक निश्चय कर लिया कि अब वह अपने लड्डू गोपाल को याद ही नहीं करेगी, ताकि उसके कान्हा को उसकी वजह से कोई कष्ट न हो।
जब भक्त ने भगवान को याद करना छोड़ दिया
महिला ने अपने मन को समझाया और लड्डू गोपाल को याद करना बंद कर दिया।
वह पूजा करती, सेवा करती, भोग लगाती, आरती करती, लेकिन अब पहले जैसा प्रेम और स्मरण उसके मन में नहीं था। उसने सोचा कि यदि वह कान्हा को याद करेगी तो उन्हें हिचकी आएगी और उन्हें कष्ट होगा।
लेकिन कुछ ही दिनों में उसका जीवन बदलने लगा।
जो महिला हर समय प्रसन्न रहती थी, अब उदास रहने लगी। उसका मन किसी काम में नहीं लगता था। धीरे-धीरे उसका स्वास्थ्य भी बिगड़ने लगा। वह भीतर से बिल्कुल टूटने लगी।
भगवान से दूर रहने का यह विरह उसके लिए असहनीय हो गया, लेकिन वह अपने मन में किए संकल्प के कारण अपने कान्हा को याद नहीं करती थी।
भक्त के प्रेम ने भगवान को भी व्याकुल कर दिया
एक दिन वह महिला बहुत थकी हुई थी और सो रही थी। तभी उसे अनुभव हुआ कि कोई उसके पैरों के पास खड़ा है।
उसने एक मधुर और करुण स्वर सुना—
"मैया! तुमने मुझे याद करना क्यों छोड़ दिया?"
वह स्वर सुनकर महिला चौंक गई।
फिर वही आवाज आई—
"मैया, तुमने मुझे याद करना छोड़ दिया, इसलिए मैं स्वयं तुम्हारे पास चला आया। तुम्हारा प्रेम मुझे हमेशा तुम्हारी ओर खींचता है। मैं तुम्हारे प्रेम के बिना नहीं रह सकता। उठो मैया! जैसे पहले मेरी सेवा करती थीं, वैसे ही फिर से मेरी सेवा करो। जैसे हर क्षण मुझे प्रेम से याद करती थीं, वैसे ही फिर से मुझे याद करो। अब तुम्हारे बिना मुझसे भी नहीं रहा जाता।"
भगवान के इन वचनों को सुनकर जैसे ही महिला ने अपनी आंखें खोलीं, उसकी आंखों के सामने साक्षात् बांके बिहारी जी खड़े थे।
अपने आराध्य के दर्शन होते ही वह भाव-विभोर हो गई। वह दौड़कर भगवान के चरणों में गिर पड़ी और फूट-फूटकर रोने लगी।
उसकी आंखों से प्रेम और आनंद के आंसू बहने लगे। वह कहने लगी—
"अहोभाग्य मेरे प्रभु! मेरे जैसे गरीब और अज्ञानी भक्त के द्वार पर स्वयं आप पधारे हैं। इससे बड़ा सौभाग्य मेरे जीवन में और क्या हो सकता है!"
उस दिन के बाद उसने फिर से उसी प्रेम और श्रद्धा के साथ अपने लड्डू गोपाल की सेवा आरंभ कर दी।
वह उन्हें स्नान कराती, सुंदर वस्त्र पहनाती, चंदन का तिलक लगाती, प्रेम से भोग लगाती और आरती करती। अब उसके जीवन में फिर से वही आनंद लौट आया था।
भगवान को चाहिए केवल सच्चा प्रेम
इस कथा का संदेश अत्यंत सुंदर और गहरा है।
भगवान को धन, वैभव और दिखावे की आवश्यकता नहीं होती। भगवान तो केवल भक्त के सच्चे और निश्छल प्रेम के भूखे होते हैं। जब भक्त उन्हें पूरे मन से पुकारता है, तो वह पुकार परमात्मा तक अवश्य पहुंचती है।
सच्ची भक्ति में कोई बड़ा-छोटा नहीं होता। प्रेम से चढ़ाया गया एक छोटा-सा लड्डू भी भगवान के लिए उतना ही मूल्यवान है, जितना किसी भक्त द्वारा चढ़ाया गया भव्य भोग। क्योंकि भगवान वस्तु नहीं, भाव देखते हैं।
जब भक्त का प्रेम सच्चा होता है, तो भगवान भी अपने भक्त से दूर नहीं रह पाते। भक्त उन्हें याद करता है, तो भगवान भक्त के हृदय में बसते हैं और जब भक्त उनसे दूर होने लगता है, तो वही परमात्मा प्रेम के बंधन में बंधकर अपने भक्त के पास चले आते हैं।
इसलिए अपने आराध्य को प्रेम से याद करते रहिए। उनके नाम का स्मरण करते रहिए। अपने सुख-दुःख उनसे साझा करते रहिए। क्योंकि वह परम पिता परमात्मा हमारे बाहर ही नहीं, बल्कि हम सबके हृदय में भी निवास करते हैं।
भक्ति का सार यही है—भगवान को पाने के लिए बड़े-बड़े कर्मकांड से अधिक आवश्यक है एक सच्चा, सरल और निष्कपट हृदय।
आइए, हम भी अपने हृदय में प्रेम और श्रद्धा का दीप जलाएं और पूरे विश्वास के साथ अपने कान्हा को पुकारें—
प्रेम से बोलो वृंदावन बिहारी लाल की जय!🙏🌺 जय जय श्री राधे-कृष्ण! 🌺🙏
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