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प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद

प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद

कुमार महेंद्र
शब्द-शब्द यथार्थ-स्नात,
जन-मन का जागृत विश्वास।
निर्धन, दलित, किसान की पीड़ा,
नारी-गरिमा का उज्ज्वल प्रकाश।
ग्राम्य धरा की पीर समेटे,
मानवता का अमर संवाद।
प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद।।


सत्य बना हर रचना का पथ,
अन्यायों पर प्रखर प्रहार।
छुआछूत की जर्जर बेड़ियाँ,
टूटीं बनकर शब्द-कटार।
सामंती तम को चीर गूँजा,
जन-जन का नव प्रतिवाद।
प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद।।


संघर्षों की तपती भट्ठी में,
कुंदन-सी निखरी लेखनी।
लोक-हृदय का दर्पण बनकर,
अमर हुई हर रचना उनकी।
यश, वैभव से सदा विरक्त,
जनहित जिसका रहा आधार।
प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद।।


गोदान, गबन, सेवासदन,
निर्मला, रंगभूमि की शान।
हर उपन्यास समाज का दर्पण,
हर कहानी जन का सम्मान।
अक्षर-अक्षर दीप जलाकर,
मिटा गया मन का अवसाद।
प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद।।


जब तक भूखा पेट रहेगा,
जब तक होगा अन्याय।
जब तक श्रम का मान घटेगा,
जब तक मनुज रहेगा असहाय।
तब तक गूँजेगा भारत भर,
तुम्हारा अमर साहित्य-निनाद।
प्रेमचंद की कलम, सामाजिक चेतना का सिंहनाद।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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