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आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर

आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर

कुमार महेंद्र
भौगोलिक बंधन टूटे थे,
सैंतालीस के उस भाल पर।
पर कुछ जंजीरें शेष अभी,
रूढ़ि-रिवाजों के जाल पर।
वैचारिक दासता तोड़कर,
नव-चेतना की भरें भोर।
आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर।।


भेदभाव की ऊँची दीवारें,
प्रेम-समरसता से ढहानी हैं।
जाति-धर्म की संकीर्ण सोच,
मिलकर आज मिटानी है।
आभासी जालों से निकलें,
सत्य-ज्ञान का थामें छोर।
आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर।।


हर भूखे की थाली में अब,
अन्न-प्रसन्नता मुस्काए।
श्रमिक-किसान के सूने आँगन,
सुख का सूरज उग आए।
भ्रष्टाचार मिटे, न्याय खिले,
कर्तव्यों पर दें पूरा जोर।
आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर।।


विज्ञान-सृजन की ऊँची उड़ानें,
अंबर पर इतिहास लिखें।
युवा-शक्ति, कौशल के बल पर,
नवभारत का विश्वास लिखें।
माटी का कण-कण बोल उठे,
आत्मनिर्भरता का जयघोष चहुँओर।
आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर।।


नहीं चाहिए केवल उत्सव,
नहीं चाहिए केवल जयगान।
स्वतंत्रता का अर्थ बने अब,
जन-जन का उत्थान।
कलम बने संकल्प हमारा,
कर्म बने इसका जयघोष पुरजोर।
आओ कदम बढ़ाएँ, स्वतंत्रता 2.0 की ओर।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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