NOTA : लोकतंत्र का खिलौना या जनता की असली शक्ति?
- जनता की "ना" का सम्मान कब होगा?
डॉ. राकेश दत्त मिश्र
भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक यह है कि यहां जनता को सर्वोच्च बताया जाता है, लेकिन उसकी असहमति को सर्वोच्च नहीं माना जाता। संविधान कहता है कि सत्ता का स्रोत जनता है। चुनाव आयोग कहता है कि हर वोट की कीमत है। राजनीतिक दल चुनाव के समय कहते हैं कि "जनता जनार्दन है।" लेकिन जब वही जनता एक स्वर में कहती है—"हमें इनमें से कोई भी उम्मीदवार स्वीकार नहीं"—तो पूरी व्यवस्था अचानक बहरी हो जाती है।
यहां से शुरू होती है NOTA की कहानी।
NOTA अर्थात "None of the Above"—उपरोक्त में से कोई नहीं। सुनने में यह लोकतंत्र का अत्यंत शक्तिशाली हथियार प्रतीत होता है। ऐसा लगता है कि अब जनता के हाथ में उम्मीदवारों को अस्वीकार करने की शक्ति आ गई है। लेकिन जब हम इसकी वास्तविकता देखते हैं, तो पता चलता है कि यह तलवार बिना धार की है, बंदूक बिना गोली की है और अधिकार बिना परिणाम का है।
आज भारत में यदि किसी निर्वाचन क्षेत्र में NOTA को सबसे अधिक मत मिल जाएं, तब भी चुनाव निरस्त नहीं होता। जनता ने सभी उम्मीदवारों को नकार दिया, फिर भी उन्हीं में से कोई एक जनता का प्रतिनिधि बन जाता है। इससे बड़ा लोकतांत्रिक विरोधाभास और क्या हो सकता है?
लोकतंत्र का यह कैसा गणित?
बचपन में हमें पढ़ाया गया था कि बहुमत का सम्मान लोकतंत्र का आधार है। यदि किसी निर्णय के पक्ष में बहुमत हो, तो वही निर्णय लागू होता है।
लेकिन चुनावी व्यवस्था में यह सिद्धांत अचानक बदल जाता है।
यदि दस लाख मतदाताओं में से चार लाख लोग किसी उम्मीदवार को वोट दें और छह लाख लोग NOTA दबाकर सभी उम्मीदवारों को नकार दें, तब भी चार लाख मत पाने वाला व्यक्ति विजेता घोषित कर दिया जाएगा।
अर्थात बहुमत ने अस्वीकार किया, अल्पमत ने स्वीकार किया और सत्ता स्वीकार करने वाले के हाथ में चली गई।
क्या इसे लोकतांत्रिक न्याय कहा जा सकता है?
यदि किसी कंपनी के 60 प्रतिशत शेयरधारक किसी प्रस्ताव को खारिज कर दें तो प्रस्ताव गिर जाता है। यदि संसद में बहुमत किसी विधेयक के खिलाफ हो तो विधेयक गिर जाता है। यदि न्यायालय में बहुमत किसी निर्णय के विरुद्ध हो तो वह निर्णय नहीं माना जाता।
फिर चुनाव में जनता की सामूहिक अस्वीकृति क्यों अमान्य हो जाती है?
क्या NOTA केवल लोकतांत्रिक दिखावा है?
यह प्रश्न कठोर अवश्य है, लेकिन आवश्यक भी है।
क्या NOTA वास्तव में मतदाता का अधिकार है या लोकतंत्र की सजावट?
आज NOTA दबाने वाला मतदाता व्यवस्था को यह संदेश देता है कि उसे कोई उम्मीदवार पसंद नहीं। लेकिन व्यवस्था उस संदेश को सुनकर कहती है—"धन्यवाद, आपकी शिकायत दर्ज कर ली गई है। अब कृपया घर जाइए, क्योंकि परिणाम पर इसका कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।"
क्या यह जनता के साथ बौद्धिक छल नहीं है?
यदि किसी अधिकार का कोई परिणाम नहीं है, तो वह अधिकार कितना वास्तविक है?
एक ऐसे बटन का क्या महत्व है जो केवल नाराजगी रिकॉर्ड करे, परिवर्तन नहीं?
राजनीतिक दल NOTA से क्यों नहीं डरते?
क्योंकि उन्हें पता है कि NOTA उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता।
आज राजनीतिक दल टिकट वितरण के समय सबसे पहले क्या देखते हैं?
क्या वे चरित्र देखते हैं?
क्या वे सामाजिक सेवा देखते हैं?
क्या वे जनविश्वास देखते हैं?
अधिकांश मामलों में उत्तर नकारात्मक होगा।
देखा जाता है—
· जातीय समीकरण,
· धनबल,
· बाहुबल,
· परिवारवाद,
· चुनावी प्रबंधन क्षमता,
· दलगत निष्ठा,
· गुटीय संतुलन।
जनता अंतिम चरण में आती है।
राजनीतिक दल जानते हैं कि यदि जनता नाराज होगी तो NOTA दबा देगी। लेकिन चुनाव तो फिर भी उन्हीं के उम्मीदवारों में से कोई जीत जाएगा।
इसलिए NOTA वर्तमान स्वरूप में दलों के लिए खतरा नहीं, बल्कि सुविधा है।
चुनाव या टिकटों का व्यापार?
आज भारतीय राजनीति का एक कड़वा सच यह भी है कि अनेक क्षेत्रों में टिकट विचारधारा से अधिक प्रभाव और संसाधनों के आधार पर दिए जाते हैं।
कई बार जनता के बीच वर्षों तक काम करने वाला सामाजिक कार्यकर्ता टिकट नहीं पाता, जबकि अचानक किसी बड़े नेता का रिश्तेदार, कोई धनकुबेर या दल बदलकर आया व्यक्ति उम्मीदवार बना दिया जाता है।
जनता के सामने विकल्प क्या बचता है?
एक दल का वंशवाद?
दूसरे दल का अवसरवाद?
तीसरे दल का जातीय समीकरण?
चौथे दल का धनबल?
और फिर कहा जाता है—इनमें से किसी एक को चुनिए।
यदि जनता इन सभी को नकार दे तो भी व्यवस्था कहती है कि इन्हीं में से किसी एक को स्वीकार करना पड़ेगा।
यही वह स्थिति है जहां NOTA को वास्तविक शक्ति देने की आवश्यकता महसूस होती है।
हमारा प्रस्ताव: जनता की अस्वीकृति को संवैधानिक शक्ति मिले
हमारा स्पष्ट मत है कि यदि किसी क्षेत्र में NOTA प्रथम स्थान प्राप्त करे तो—
1. चुनाव तत्काल निरस्त घोषित हो।
2. पुनः चुनाव कराया जाए।
3. जनता द्वारा अस्वीकृत सभी उम्मीदवारों को पुनः चुनाव लड़ने की अनुमति न दी जाए।
4. ऐसे उम्मीदवारों को अगले दस वर्षों तक किसी भी स्तर का चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाए।
5. संबंधित राजनीतिक दलों को नए उम्मीदवार प्रस्तुत करने के लिए बाध्य किया जाए।
कुछ लोगों को यह कठोर लग सकता है। लेकिन लोकतंत्र में जनता की अस्वीकृति का कोई महत्व नहीं होगा तो फिर लोकतंत्र का अर्थ ही क्या रह जाएगा?
दस वर्ष का प्रतिबंध क्यों?
कई लोग पूछ सकते हैं कि दस वर्ष क्यों?
उत्तर सरल है।
क्योंकि जनता की सामूहिक अस्वीकृति साधारण घटना नहीं है।
यदि किसी उम्मीदवार को चुनाव में हार मिलती है तो यह राजनीतिक पराजय है।
लेकिन यदि NOTA उससे आगे निकल जाता है, तो यह केवल पराजय नहीं, बल्कि सार्वजनिक अस्वीकृति है।
इसका अर्थ है कि जनता ने कहा—
"हम आपको अपना प्रतिनिधि मानने को तैयार नहीं हैं।"
ऐसी स्थिति में केवल अगला चुनाव आने तक प्रतीक्षा करना पर्याप्त नहीं होना चाहिए।
राजनीति अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व है।
तब राजनीति बदलने लगेगी
जिस दिन NOTA प्रभावी हो जाएगा, उसी दिन राजनीति बदलनी शुरू हो जाएगी।
उस दिन दलों को टिकट देने से पहले सोचना पड़ेगा।
उस दिन उम्मीदवारों की सामाजिक प्रतिष्ठा महत्वपूर्ण हो जाएगी।
उस दिन चुनाव जीतने की मशीनें नहीं, जनविश्वास वाले लोग खोजे जाएंगे।
उस दिन अपराधियों, दल-बदलुओं, अवसरवादियों और केवल धनबल पर टिके नेताओं के लिए रास्ता कठिन हो जाएगा।
उस दिन राजनीति में चरित्र की वापसी शुरू होगी।
क्या बार-बार चुनाव होंगे?
यह तर्क अक्सर दिया जाता है।
लेकिन प्रश्न है—
क्या बार-बार खराब उम्मीदवार देना स्वीकार्य है?
या बार-बार चुनाव होना?
यदि राजनीतिक दल अच्छे उम्मीदवार देंगे तो NOTA प्रथम स्थान पर क्यों आएगा?
बार-बार चुनाव होना समस्या नहीं है।
बार-बार जनता की उपेक्षा होना समस्या है।
लोकतंत्र की कीमत चुनावी खर्च नहीं, जनविश्वास से तय होती है।
लोकतंत्र में जनता मालिक है या ग्राहक?
वर्तमान व्यवस्था जनता को ग्राहक की तरह देखती है।
उसे कुछ सीमित विकल्प दिए जाते हैं और कहा जाता है कि इनमें से चुनिए।
लेकिन लोकतंत्र में जनता ग्राहक नहीं, मालिक होती है।
मालिक को यह अधिकार होना चाहिए कि वह कह सके—
"मुझे इनमें से कोई स्वीकार नहीं।"
और यदि मालिक ऐसा कहे, तो पूरी व्यवस्था को पुनर्विचार करना चाहिए।
राजनीतिक दलों को सबसे बड़ा भय
सच तो यह है कि अधिकांश राजनीतिक दल NOTA की वास्तविक शक्ति से डरते हैं।
क्योंकि जिस दिन जनता की अस्वीकृति प्रभावी हो जाएगी, उस दिन टिकट वितरण की राजनीति बदल जाएगी।
वंशवाद कठिन हो जाएगा।
जातिवाद कमजोर पड़ेगा।
धनबल की उपयोगिता घटेगी।
बाहुबल का प्रभाव कम होगा।
और जनता पहली बार केवल वोटर नहीं, निर्णायक बन जाएगी।
लोकतंत्र की अगली क्रांति
भारत ने सार्वभौमिक मताधिकार की क्रांति देखी।
महिलाओं के मतदान अधिकार की क्रांति देखी।
दलितों, पिछड़ों और वंचितों की राजनीतिक भागीदारी की क्रांति देखी।
अब समय है लोकतंत्र की अगली क्रांति का—
"राइट टू रिजेक्ट" अर्थात प्रभावी अस्वीकृति का अधिकार।
जब तक जनता को अयोग्य उम्मीदवारों को बाहर करने की शक्ति नहीं मिलेगी, तब तक लोकतंत्र अधूरा रहेगा।
निष्कर्ष: जनता की "ना" को भी जनादेश मानिए
लोकतंत्र केवल "हाँ" का नाम नहीं है।
लोकतंत्र "ना" का सम्मान करना भी सिखाता है।
यदि जनता किसी उम्मीदवार को चुनती है तो वह जनादेश है।
लेकिन यदि जनता सभी उम्मीदवारों को नकार देती है, तो वह भी जनादेश ही है।
उस जनादेश की अनदेखी करना लोकतंत्र की आत्मा की अनदेखी करना है।
आज आवश्यकता है कि संसद, चुनाव आयोग, विधि आयोग, राजनीतिक दल और नागरिक समाज इस विषय पर गंभीर राष्ट्रीय बहस प्रारंभ करें।
NOTA को सांकेतिक बटन नहीं, वास्तविक लोकतांत्रिक हथियार बनाया जाए।
जिस दिन जनता की अस्वीकृति को भी उतना ही सम्मान मिलेगा जितना उसकी स्वीकृति को मिलता है, उसी दिन भारतीय लोकतंत्र वास्तव में परिपक्व कहलाएगा।
और तब शायद पहली बार मतदाता यह महसूस करेगा कि वह केवल वोट डालने वाला नागरिक नहीं, बल्कि राष्ट्र की सत्ता का वास्तविक स्वामी है।
क्योंकि लोकतंत्र में अंतिम शब्द नेता का नहीं, जनता का होना चाहिए।
और यदि जनता कह रही है-"इनमें से कोई नहीं"-तो लोकतंत्र को झुककर कहना चाहिए- "आपका निर्णय स्वीकार है।"
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