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संतोष

संतोष

जय प्रकाश कुवंर
धरती पर न जाने वह दिन कब आएगा।
जबआदमी का मन संतोष से भर पाएगा।।
आदमी जीवन में चाहे जितना भी पाता है।
और अधिक पाने का लालसा बढ़ते जाता है।।
आदमी को सब कुछ पाकर भी संतोष नहीं है।
सब भरपूर मिल जाने पर भी उसे होश नहीं है।।
इसी और अधिक पाने की हरदम लालसा में,
आदमी अपना शुकून चैन खोकर छटपटाता है।
वह जवानी बुढ़ापा, सुख दुख के खुशी से बंचित हो,
असंतोष की मुद्रा में ही ,आखिर एक दिन मर जाता है।।
ईश्वर ने जो भी दिया है,जीवन जीने के लिए भरपूर है,
ईमानदारी से काम करते हुए जब यह संतोष आएगा।
हर आदमी के जीवन से सब कष्टों का निवारण हो,
हर आदमी का जीवन दुनिया में सुखमय हो जाएगा।।
जय प्रकाश कुवंर
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