"पूर्णता का उत्सव"
पंकज शर्मासुख का स्रोत न मापा जाए
संचित स्वर्ण-भंडारों से;
वह तो चुपचाप खिल उठता
मन के निर्मल द्वारों से।
थोड़ा यदि अपनापन हो,
थोड़ी कृतज्ञ दृष्टि रहे;
सूनी मुट्ठी भी जीवन की
पूर्ण धरोहर-सी लगे।
इच्छाओं के अनगिन मेघ
जब अंतर से छँट जाते;
संतोष के श्वेत प्रभात
निश्शब्द स्वयं उग आते।
पूर्ण वही, जो हर अभाव
में भी अवसर पढ़ लेता;
एक कण में सागर का
अमिट विस्तार गढ़ लेता।
धन का वैभव क्षणभंगुर,
मन का वैभव चिरजीवी;
कृतज्ञ हृदय के सम्मुख
फीकी हर उपलब्धि रही।
जीवन का अनुपम उत्सव
संचय में कब बसता है?
जो थोड़ा है, उसी में ही
अनन्त स्वयं हँसता है।
वही धनी, वही संपन्न—
जिसने संतोष साध लिया।
. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8


0 टिप्पणियाँ
दिव्य रश्मि की खबरों को प्राप्त करने के लिए हमारे खबरों को लाइक ओर पोर्टल को सब्सक्राइब करना ना भूले| दिव्य रश्मि समाचार यूट्यूब पर हमारे चैनल Divya Rashmi News को लाईक करें |
खबरों के लिए एवं जुड़ने के लिए सम्पर्क करें contact@divyarashmi.com
#NEWS,
#hindinews