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आराम

आराम

जय प्रकाश कुवंर
आंखों ने उसे देखा, दिल ने उसे चाहा,
इस मन का क्या दोष,
जो उस उम्रदराज हसीना पर आ गया।
उसने मुस्कराकर बड़ी नजाकत से कहा,
अब परिश्रम का नहीं, अब
आपके आराम करने का दिन है आ गया।।
उसे क्या पता कि आराम हराम है,
जब तक जियो तब तक,
जीवन में बस कुछ काम ही काम है।
खुद ईश्वर ने दुनिया में भेजा है सक्रिय रहने के लिए,
निष्क्रिय हो जाने पर उसने, श्मशान में,
अपने पराये सब लोगों से दूर,
सबके लिए चिता की व्यवस्था की है,
जिस पर लेटकर फिर, विश्राम ही विश्राम है।

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