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"प्रकृति का आगमन"

"प्रकृति का आगमन"

(जलहरण घनाक्षरी)
रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
रिमझिम, जलवृष्टि, रचती, विचित्र सृष्टि,
जिसकी, जैसी हो दृष्टि,
आती, वैसा रूप धर ।

झूले, सब बाग-बाग, गूँजे, नया-नया राग,
सोया, भाग्य गया जाग,
नाचे, मोर छत पर ।

खिले हैं, चमेली फूल, महके, नदी के कूल,
राही, सब गए भूल,
संकट, था पथ पर ।

अंबर, से गिरे धार, धरती, का बढ़े प्यार,
हरषाए, बार-बार,
जीव, जितने भू पर ।


चहके, पपीहे डाल-डाल, मिले, सुर- तान,
कोयल, के नव गान,
गूँजे, कूक घर-घर।


सरिता, बहती कल-कल, धुलते, आँचल,
झरते हैं अविरल,
मोती, जैसे झर-झर।


लहरें, धानी खेत-खेत, हँसती, भू समेत,
कली, फूटे नव चेत,
छाई, हरितिमा भर।


गाएँ, मंगल गीत, मिटते, मन के संदेह,
प्रकृति, बरसा स्नेह,पावन, हो जग भर।

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