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चुनावी समाजसेवा प्राइवेट लिमिटेड

चुनावी समाजसेवा प्राइवेट लिमिटेड

  • बांकीपुर उपचुनाव, जातीय राजनीति और युवाओं के भविष्य की नीलामी

डॉ. राकेश दत्त मिश्र

भारत को लोकतंत्र की जननी कहा जाता है। यह वह देश है जहां चुनाव केवल सरकार बनाने की प्रक्रिया नहीं, बल्कि भावनाओं, नारों, जातीय समीकरणों, धार्मिक प्रतीकों, सामाजिक पहचानों और राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का विराट मेला बन जाते हैं। चुनाव आते ही देश में एक अद्भुत परिवर्तन दिखाई देता है। जो नेता पांच वर्षों तक जनता से दूरी बनाए रखते हैं, वे अचानक जनसेवक बन जाते हैं। जो संगठन वर्षों तक निष्क्रिय रहते हैं, उनमें जीवन लौट आता है। जो समाज के स्वयंभू ठेकेदार अपने वातानुकूलित कक्षों में चिंतन कर रहे होते हैं, वे अचानक समाज की चिंता में दुबले होने लगते हैं।

बांकीपुर उपचुनाव की संभावनाओं के बीच बिहार की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही दृश्य उभर रहा है। समाज, सम्मान, प्रतिनिधित्व, अस्मिता और हिस्सेदारी जैसे शब्द अचानक राजनीतिक शब्दकोश के सबसे लोकप्रिय शब्द बन गए हैं। प्रेस वार्ताएं हो रही हैं। बैठकें आयोजित हो रही हैं। जातीय संगठनों की सक्रियता बढ़ गई है। ऐसा लगता है मानो यदि यह चुनाव हार गए तो समाज का अस्तित्व ही समाप्त हो जाएगा।

लेकिन इस पूरे राजनीतिक नाटक में एक पात्र गायब है—युवा।

वह युवा जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहा है।

वह युवा जो विश्वविद्यालयों में अवसर खोज रहा है।

वह युवा जो UGC की नीतियों से प्रभावित है।

वह युवा जो रोजगार के लिए भटक रहा है।

वह युवा जो इस देश के भविष्य का निर्माण कर सकता है, लेकिन चुनावी भाषणों में कहीं दिखाई नहीं देता।
समाज का सम्मान और छात्र का भविष्य

हमारे यहां समाज के सम्मान की परिभाषा बड़ी विचित्र है।

यदि किसी समाज का व्यक्ति सांसद बन जाए, तो समाज सम्मानित हो जाता है।

यदि कोई मंत्री बन जाए, तो समाज गौरवान्वित हो जाता है।

यदि टिकट मिल जाए, तो समाज की जीत हो जाती है।

लेकिन यदि उसी समाज का एक प्रतिभाशाली छात्र आर्थिक अभाव में पढ़ाई छोड़ दे, तो समाज की प्रतिष्ठा को कोई आंच नहीं आती।

यदि उसी समाज का शोधार्थी अवसरों के अभाव में अपना शोध अधूरा छोड़ दे, तो समाज का सम्मान सुरक्षित रहता है।

यदि उसी समाज का युवा बेरोजगारी से त्रस्त होकर निराशा में डूब जाए, तब भी समाज की अस्मिता अक्षुण्ण बनी रहती है।

यह कैसी विडम्बना है?

यह कैसी सामाजिक चेतना है?

क्या समाज का सम्मान नेताओं की कुर्सियों से तय होगा या युवाओं की उपलब्धियों से?
चुनावी मौसम के समाजसेवी

भारत में दो प्रकार के समाजसेवी होते हैं।

पहले वे, जो पूरे वर्ष समाज के बीच रहते हैं।

दूसरे वे, जो चुनाव की घोषणा के बाद प्रकट होते हैं।

पहले प्रकार के समाजसेवी दुर्लभ होते जा रहे हैं।

दूसरे प्रकार की संख्या तेजी से बढ़ रही है।

ये लोग चुनाव आते ही समाज के रक्षक बन जाते हैं।

वे बताते हैं कि समाज संकट में है।

समाज को एकजुट होना चाहिए।

समाज को अपनी ताकत दिखानी चाहिए।

समाज को अपना प्रतिनिधि चुनना चाहिए।

लेकिन यदि उनसे पूछा जाए कि पिछले पांच वर्षों में उन्होंने समाज के विद्यार्थियों के लिए क्या किया, तो उत्तर अक्सर मौन होता है।

यदि पूछा जाए कि उन्होंने कितने बेरोजगार युवाओं की सहायता की, तो उत्तर अस्पष्ट होता है।

यदि पूछा जाए कि उन्होंने शिक्षा व्यवस्था पर कब संघर्ष किया, तो उत्तर विषयांतर में बदल जाता है।
बांकीपुर और जातीय गणित

बांकीपुर बिहार की राजनीति का एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है। यहां राजनीतिक दलों की रणनीतियों में जातीय समीकरणों की चर्चा अक्सर प्रमुख रहती है। यह कोई नई बात नहीं है। भारतीय राजनीति लंबे समय से पहचान आधारित राजनीति के प्रभाव में रही है।

लेकिन प्रश्न यह है कि क्या बांकीपुर का मतदाता केवल जातीय पहचान से अपनी समस्याओं का समाधान खोज सकता है?

क्या बेरोजगारी जाति देखकर आती है?

क्या महंगाई जाति देखकर बढ़ती है?

क्या शिक्षा संकट जाति देखकर प्रभावित करता है?

क्या UGC की नीतियां किसी विशेष जाति के छात्रों पर ही लागू होती हैं?

यदि नहीं, तो फिर चुनावी विमर्श का केंद्र केवल जातीय प्रतिनिधित्व क्यों बन जाता है?
UGC और भविष्य का प्रश्न

आज उच्च शिक्षा व्यवस्था अनेक चुनौतियों से जूझ रही है।

शोध की गुणवत्ता पर प्रश्न हैं।

स्थायी नियुक्तियों की कमी है।

अनुबंध आधारित रोजगार बढ़ रहे हैं।

प्रतिस्पर्धा तीव्र हो रही है।

विश्वविद्यालय संसाधनों की कमी से जूझ रहे हैं।

लेकिन इन मुद्दों पर राजनीतिक दलों की गंभीरता कम दिखाई देती है।

क्यों?

क्योंकि शिक्षा की राजनीति कठिन है।

जाति की राजनीति आसान है।

शिक्षा पर बहस करनी पड़ेगी।

जाति पर भावनाएं भड़कानी पड़ेंगी।

शिक्षा में समाधान चाहिए।

जाति में केवल नारा काफी है।
लोकतंत्र का बाजार

भारतीय लोकतंत्र धीरे-धीरे एक ऐसे बाजार में बदलता जा रहा है जहां विचारों की तुलना में पहचान की अधिक कीमत है।

यहां विकास का मूल्यांकन कम होता है, सामाजिक समीकरणों का अधिक।

यहां नीति पर चर्चा कम होती है, प्रतीकों पर अधिक।

यहां युवाओं के भविष्य से अधिक नेताओं के भविष्य पर विमर्श होता है।

चुनाव आते ही समाजों की नीलामी शुरू हो जाती है।

किस समाज के कितने वोट हैं?

किस समाज का प्रभाव कितना है?

किस समाज को कौन सा पद दिया जाए?

किस समाज को कौन सा आश्वासन दिया जाए?

और इसी प्रक्रिया में वास्तविक मुद्दे कहीं पीछे छूट जाते हैं।
समाज का सबसे बड़ा धोखा

समाज को सबसे बड़ा धोखा विरोधी दल नहीं देते।

समाज को सबसे बड़ा धोखा वे लोग देते हैं जो समाज के नाम पर अपनी राजनीति चमकाते हैं।

जो समाज को यह विश्वास दिलाते हैं कि उनका राजनीतिक उत्थान ही समाज का उत्थान है।

जो अपनी महत्वाकांक्षाओं को सामाजिक संघर्ष का नाम दे देते हैं।

जो टिकट की लड़ाई को समाज की लड़ाई बना देते हैं।

जो व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा को सामूहिक सम्मान का प्रश्न बना देते हैं।
युवा क्या करे?

युवा को अब प्रश्न पूछना सीखना होगा।

जब कोई नेता वोट मांगने आए, तो उससे पूछिए—

आपने विश्वविद्यालयों के लिए क्या किया?

आपने रोजगार के लिए क्या किया?

आपने शोधार्थियों के लिए क्या किया?

आपने छात्रों के लिए क्या किया?

आपने शिक्षा सुधार के लिए क्या किया?

यदि उत्तर नहीं है, तो समझ लीजिए कि समाज के नाम पर राजनीति हो रही है, समाज सेवा नहीं।
दिव्य रश्मि की दृष्टि

"दिव्य रश्मि" का मानना है कि समाज का उत्थान जातीय प्रतिनिधित्व से नहीं, बौद्धिक प्रतिनिधित्व से होगा।

समाज तब आगे बढ़ेगा जब उसके बच्चे शिक्षित होंगे।

जब उसके युवा रोजगार पाएंगे।

जब विश्वविद्यालय मजबूत होंगे।

जब शोध को प्रोत्साहन मिलेगा।

जब राजनीति का केंद्र जाति नहीं, ज्ञान बनेगा।
अंतिम प्रश्न

बांकीपुर के मतदाता, बिहार के नागरिक और देश के युवा स्वयं से एक प्रश्न पूछें—

यदि कल आपका बेटा या बेटी उच्च शिक्षा के संकट का शिकार हो जाए, यदि उसे अवसर न मिले, यदि उसका भविष्य अंधकारमय हो जाए, तो क्या चुनावी मौसम में समाज का झंडा उठाने वाले नेता उसके साथ खड़े होंगे?

यदि उत्तर "नहीं" है, तो समय आ गया है कि राजनीति से भी बड़ा प्रश्न पूछा जाए।

जाति नहीं, भविष्य।

प्रतिनिधित्व नहीं, अवसर।

नारा नहीं, शिक्षा।

सम्मेलन नहीं, रोजगार।

और यही वह प्रश्न है जो किसी भी समाज को वास्तविक सम्मान दिला सकता है। अन्यथा चुनाव आते रहेंगे, समाज बचाने के नारे लगते रहेंगे, नेता बदलते रहेंगे और युवाओं का भविष्य हर बार चुनावी गणित की वेदी पर बलि चढ़ता रहेगा।
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