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भारत की सबसे बड़ी विडंबना: स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी हिंदी क्यों नहीं बन सकी राष्ट्रजीवन की प्रमुख भाषा?

भारत की सबसे बड़ी विडंबना: स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी हिंदी क्यों नहीं बन सकी राष्ट्रजीवन की प्रमुख भाषा?

  • अनुच्छेद 351 की संवैधानिक भावना, राजनीतिक इच्छाशक्ति और राष्ट्रीय अस्मिता पर एक विचार

लेखक : डॉ. राकेश दत्त मिश्र

"निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटत न हिय के शूल॥"

भारतेन्दु हरिश्चन्द्र की यह पंक्ति आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी उन्नीसवीं शताब्दी में थी। किसी भी राष्ट्र की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है और संस्कृति का सबसे सशक्त माध्यम उसकी भाषा होती है। संसार का कोई भी विकसित राष्ट्र ऐसा नहीं है जिसने अपनी मातृभाषा या राष्ट्रीय भाषा की उपेक्षा करके स्थायी प्रगति प्राप्त की हो। जापान ने जापानी, चीन ने चीनी (मंदारिन), फ्रांस ने फ्रेंच, जर्मनी ने जर्मन, रूस ने रूसी और इज़राइल ने हिब्रू को अपने राष्ट्रीय विकास का आधार बनाया।

भारत विश्व की सबसे प्राचीन सभ्यता, सबसे बड़ा लोकतंत्र और अनेक भाषाओं वाला महान राष्ट्र है। फिर भी स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी भारत अपनी ही भाषाओं, विशेषकर हिंदी, को शासन, न्याय, विज्ञान, तकनीक और उच्च शिक्षा की प्रमुख भाषा नहीं बना सका। यही इस देश की सबसे बड़ी विडंबना है।
क्या वास्तव में हिंदी राष्ट्रभाषा है?

सामान्य जनमानस में यह धारणा है कि हिंदी भारत की राष्ट्रभाषा है, जबकि संवैधानिक स्थिति कुछ भिन्न है।

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी (देवनागरी लिपि) को संघ की राजभाषा घोषित किया गया है। संविधान में किसी भी भाषा को "राष्ट्रभाषा" का दर्जा नहीं दिया गया।

लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि संविधान ने हिंदी की उपेक्षा की है।

अनुच्छेद 351 स्पष्ट रूप से केंद्र सरकार को निर्देश देता है—

"संघ का यह कर्तव्य होगा कि वह हिंदी भाषा का प्रसार बढ़ाए, उसका विकास करे ताकि वह भारत की सामासिक (समन्वित) संस्कृति के सभी तत्वों की अभिव्यक्ति का माध्यम बन सके।"

यह केवल एक औपचारिक घोषणा नहीं बल्कि संविधान निर्माताओं की राष्ट्रीय दृष्टि थी।
यदि संविधान ने दायित्व दिया, तो पूरा क्यों नहीं हुआ?

यहीं से सबसे बड़ा प्रश्न प्रारंभ होता है।

26 जनवरी 1950 को संविधान लागू हुआ।

आज लगभग आठ दशक बीत चुके हैं।

इन वर्षों में देश में अनेक सरकारें आईं और गईं।

हजारों कानून बने।

सैकड़ों आयोग गठित हुए।

लाखों करोड़ रुपये विभिन्न योजनाओं पर खर्च हुए।

देश चंद्रयान और गगनयान तक पहुँच गया।

डिजिटल इंडिया बन गया।

विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया।

लेकिन क्या भारत अपने संविधान के अनुच्छेद 351 को पूरी तरह लागू कर पाया?

उत्तर है-नहीं।
क्या सरकारों ने अपनी संवैधानिक जिम्मेदारी पूरी की?

यह प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल का नहीं है।

स्वतंत्रता के बाद से अब तक केंद्र में विभिन्न दलों की सरकारें रहीं।

सभी ने हिंदी दिवस मनाया।

सभी ने राजभाषा पुरस्कार दिए।

सभी ने हिंदी पखवाड़ा आयोजित किया।

सभी ने हिंदी के विकास की बातें कीं।

लेकिन यदि ईमानदारी से मूल्यांकन किया जाए तो आज भी-

· सर्वोच्च न्यायालय की अधिकांश कार्यवाही अंग्रेज़ी में होती है।

· अधिकांश उच्च न्यायालय अंग्रेज़ी में निर्णय देते हैं।

· चिकित्सा की पढ़ाई मुख्यतः अंग्रेज़ी में है।

· इंजीनियरिंग की शिक्षा अंग्रेज़ी में है।

· प्रबंधन संस्थानों की भाषा अंग्रेज़ी है।

· वैज्ञानिक शोध का अधिकांश साहित्य अंग्रेज़ी में उपलब्ध है।

· केंद्रीय सेवाओं में अंग्रेज़ी का प्रभाव अत्यंत व्यापक है।

ऐसी स्थिति में यह कहना कठिन है कि अनुच्छेद 351 की भावना पूर्णतः साकार हो चुकी है।
क्या दोष केवल सरकारों का है?

यह कहना भी उचित नहीं होगा कि केवल सरकारें ही उत्तरदायी हैं।

यह विषय बहुआयामी है।
राजनीतिक कारण

भाषा का प्रश्न समय-समय पर राजनीतिक विवाद का विषय बना।

विशेषकर दक्षिण भारत में हिंदी थोपे जाने की आशंका ने गंभीर विरोध को जन्म दिया।

फलस्वरूप केंद्र सरकारों ने संतुलन की नीति अपनाई।
सामाजिक कारण

हम स्वयं अंग्रेज़ी को प्रतिष्ठा का प्रतीक मान बैठे।

आज अधिकांश माता-पिता अपने बच्चों को अंग्रेज़ी माध्यम में पढ़ाना चाहते हैं।

घर में हिंदी बोलने वाला व्यक्ति भी अपने बच्चे से अंग्रेज़ी में बात करने को आधुनिकता समझता है।
आर्थिक कारण

रोज़गार के अनेक क्षेत्रों में अंग्रेज़ी का ज्ञान लाभ देता है।

इस कारण समाज ने अंग्रेज़ी को अवसर की भाषा मान लिया।
क्या अंग्रेज़ी हमारी शत्रु है?

बिल्कुल नहीं।

अंग्रेज़ी एक महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय भाषा है।

उसका ज्ञान आवश्यक है।

समस्या अंग्रेज़ी सीखने में नहीं है।

समस्या तब उत्पन्न होती है जब अपनी भाषा को हीन और विदेशी भाषा को श्रेष्ठ मान लिया जाता है।

जापान अंग्रेज़ी भी सीखता है, पर शासन जापानी में चलता है।

फ्रांस अंग्रेज़ी जानता है, पर फ्रेंच का सम्मान सर्वोपरि है।

चीन विश्व व्यापार करता है, लेकिन अपनी भाषा को कभी पीछे नहीं रखता।

तो भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता?
संविधान निर्माताओं का सपना

महात्मा गांधी ने कहा था—

"राष्ट्रभाषा के बिना राष्ट्र गूँगा है।"

डॉ. राजेंद्र प्रसाद चाहते थे कि भारत की अपनी कार्यभाषा हो।

पुरुषोत्तम दास टंडन ने हिंदी के लिए आजीवन संघर्ष किया।

सेठ गोविंद दास ने संविधान सभा में हिंदी के पक्ष में प्रभावशाली तर्क दिए।

इन सभी का उद्देश्य किसी भाषा का विरोध नहीं था।

उनका उद्देश्य भारत को भाषाई आत्मनिर्भर बनाना था।
अनुच्छेद 351 केवल सलाह नहीं है

कई लोग यह मानते हैं कि अनुच्छेद 351 केवल एक औपचारिक घोषणा है।

वास्तव में यह केंद्र सरकार के लिए संवैधानिक नीति-निर्देशक प्रावधान है।

यह सरकार को स्पष्ट दिशा देता है-

· हिंदी का विकास हो।

· उसका प्रचार बढ़े।

· वह आधुनिक विज्ञान की भाषा बने।

· वह प्रशासन की भाषा बने।

· वह भारत की समन्वित संस्कृति की अभिव्यक्ति बने।

प्रश्न यह है कि यदि यह संवैधानिक दायित्व है, तो इसकी प्रगति का नियमित मूल्यांकन क्यों नहीं होता?
हिंदी बनाम भारतीय भाषाएँ-एक कृत्रिम विवाद

हिंदी का विकास तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम, बंगला, मराठी, गुजराती, उड़िया, असमिया, पंजाबी, संस्कृत, मैथिली या अन्य भारतीय भाषाओं के विरोध में नहीं होना चाहिए।

भारत की सभी भाषाएँ हमारी राष्ट्रीय धरोहर हैं।

हिंदी का उद्देश्य संपर्क और प्रशासन की भाषा बनना है, न कि अन्य भाषाओं का स्थान लेना।

वास्तविक चुनौती भारतीय भाषाओं और अंग्रेज़ी के बीच असंतुलन की है, न कि भारतीय भाषाओं के आपसी संबंधों की।
डिजिटल युग एक अवसर है

आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), मशीन अनुवाद, वॉयस तकनीक और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म भारतीय भाषाओं के लिए नए अवसर लेकर आए हैं।

यदि सरकार, विश्वविद्यालय, उद्योग और समाज मिलकर कार्य करें तो आने वाले वर्षों में हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता का ज्ञान-साहित्य और तकनीकी सामग्री तैयार की जा सकती है।
अब क्या किया जाना चाहिए?

यदि वास्तव में अनुच्छेद 351 की भावना को साकार करना है, तो केवल हिंदी दिवस मनाना पर्याप्त नहीं होगा।

आवश्यक है कि-

  • प्रशासन में भारतीय भाषाओं का प्रयोग बढ़ाया जाए।
  • न्यायपालिका में चरणबद्ध रूप से भारतीय भाषाओं का उपयोग बढ़े।
  • चिकित्सा, इंजीनियरिंग और विज्ञान की उत्कृष्ट पुस्तकों का भारतीय भाषाओं में निर्माण हो।
  • प्रतियोगी परीक्षाओं में सभी भारतीय भाषाओं को समान अवसर मिले।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डिजिटल तकनीक का उपयोग भारतीय भाषाओं के विकास के लिए किया जाए।
  • राजभाषा नीति के क्रियान्वयन की समयबद्ध समीक्षा हो और उसकी सार्वजनिक रिपोर्ट जारी की जाए।

स्वतंत्रता के लगभग आठ दशक बाद भी अनुच्छेद 351 का उद्देश्य पूरी तरह साकार नहीं हो सका है। यह चिंता का विषय है और इस पर गंभीर राष्ट्रीय विमर्श होना चाहिए। साथ ही, यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत का संविधान किसी भी भाषा को "राष्ट्रभाषा" घोषित नहीं करता; हिंदी संघ की राजभाषा है और उसके विकास का संवैधानिक दायित्व केंद्र सरकार को सौंपा गया है।

इसलिए प्रश्न किसी भाषा को दूसरों पर थोपने का नहीं, बल्कि संविधान में निहित उस संकल्प को आगे बढ़ाने का है, जिसमें हिंदी को भारत की समन्वित संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रभावी माध्यम बनाने की बात कही गई है। यह कार्य तभी सफल होगा जब केंद्र और राज्य सरकारें, शैक्षणिक संस्थान, न्यायपालिका, उद्योग जगत और समाज मिलकर भारतीय भाषाओं को ज्ञान, शासन और नवाचार का मजबूत आधार बनाएँ।

हिंदी का सम्मान तभी सार्थक होगा जब वह अन्य भारतीय भाषाओं के सम्मान के साथ आगे बढ़े। भारत की भाषाई विविधता ही उसकी सबसे बड़ी शक्ति है। इस विविधता को बनाए रखते हुए भारतीय भाषाओं को सशक्त करना ही संविधान की भावना और राष्ट्रीय हित-दोनों के अनुरूप होगा।

नोट: मैंने लेख में तथ्यात्मक और संवैधानिक स्थिति (जैसे कि भारत में कोई संवैधानिक "राष्ट्रभाषा" नहीं है) को स्पष्ट रखा है और जहाँ आलोचनात्मक विश्लेषण है, उसे मत (opinion) के रूप में प्रस्तुत किया है ताकि लेख संतुलित, शोधपरक और प्रकाशन-योग्य रहे।

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