गुरु और गुरु पूर्णिमा का महत्व
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गुरु का महत्व : गुरुदेव वे हैं, जो साधना बताते हैं, साधना करवाते हैं और आनंद की अनुभूति कराते हैं। गुरु का ध्यान शिष्य के भौतिक सुख पर नहीं, अपितु केवल उसकी आध्यात्मिक उन्नति पर होता है। गुरु ही शिष्य को साधना के लिए प्रेरणा देते हैं, चरणबद्ध तरीके से साधना करवाते हैं, साधना में आने वाली बाधाओं को दूर करते हैं, साधना में स्थिर रखते हैं और उसे पूर्णता (परिपूर्णता) की ओर ले जाते हैं। गुरु के संकल्प के बिना इतना बड़ा और कठिन शिवधनुष उठाना असंभव है। इसके विपरीत, गुरु की प्राप्ति होने पर यह कार्य सहज ही संभव हो जाता है।
गुरु शब्द की उत्पत्ति और महत्व : श्री गुरुगीता में 'गुरु' शब्द की उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार किया गया है:
गुकारस्त्वन्धकारश्च रुकारस्तेज उच्यते ।
अज्ञानग्रासकं ब्रह्म गुरुरेव न संशयः ।।- श्री गुरुगीता
अर्थ: 'गु' का अर्थ है अंधकार या अज्ञान और 'रु' का अर्थ है तेज, प्रकाश या ज्ञान। अज्ञान रूपी अंधकार को नष्ट करने वाला ब्रह्म ही गुरु है, इसमें कोई संदेह नहीं है। इससे यह स्पष्ट होता है कि साधक के जीवन में गुरु का महत्व असाधारण (अनन्यसाधारण) है। इसीलिए गुरु की प्राप्ति ही साधक का पहला लक्ष्य होता है। गुरु की प्राप्ति से ही ईश्वर की प्राप्ति होती है; या यूं कहा जा सकता है कि गुरु की प्राप्ति होना ही ईश्वर की प्राप्ति है। ईश्वर प्राप्ति का अर्थ है मोक्ष प्राप्ति, और मोक्ष प्राप्ति का अर्थ है निरंतर (अखंड) आनंद की अवस्था। इस अवस्था तक हमें गुरु ही पहुँचाते हैं। शिष्य को जीवनमुक्त करने वाले गुरु के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए ही गुरु पूर्णिमा मनाई जाती है।
गुरु पूर्णिमा का उद्देश्य और महत्व : गुरु पूर्णिमा का उत्सव हर जगह आषाढ़ पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। गुरु यानी ईश्वर का सगुण रूप! पूरे वर्ष में प्रत्येक गुरु अपने भक्तों को अध्यात्म का बोधामृत (ज्ञान रूपी अमृत) भरपूर देते रहते हैं। उन गुरुओं के प्रति अनन्य भाव से कृतज्ञता व्यक्त करना ही गुरु पूर्णिमा मनाने का मुख्य उद्देश्य है।
गुरु पूर्णिमा के शुभ दिन पर गुरु तत्व (ईश्वरीय तत्व) सामान्य दिनों की तुलना में 1 हजार गुना अधिक कार्यरत रहता है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर की गई सेवा और त्याग (सत्कर्म के लिए अर्पण) का लाभ अन्य दिनों की तुलना में 1 हजार गुना अधिक मिलता है; इसीलिए गुरु पूर्णिमा गुरु कृपा (ईश्वर कृपा) का एक अनमोल अवसर (पर्वणी) है।
गुरु पूर्णिमा उत्सव मनाने की पद्धति : सभी संप्रदायों में गुरु पूर्णिमा का उत्सव मनाया जाता है। यहाँ महत्वपूर्ण बात यह है कि गुरु एक तत्व हैं। भले ही गुरु देह (शरीर) के रूप में अलग-अलग दिखाई देते हों, लेकिन गुरु तत्व एक ही होता है। विभिन्न संप्रदायों के साथ-साथ कई संस्थाओं, संगठनों और पाठशालाओं में भी गुरु पूर्णिमा का महोत्सव अत्यंत श्रद्धा के साथ मनाया जाता है।
पूजा की विधि:
गुरु पूजन के लिए चौकी (चौरंग) को पूर्व-पश्चिम दिशा में रखना चाहिए। यदि संभव हो, तो चौकी पर छोटा मंडप बनाने के लिए केले के खंभे या केले के पत्तों का उपयोग करना चाहिए। गुरु की प्रतिमा (तस्वीर) स्थापित करने के लिए लकड़ी के मंदिर या चौकी का उपयोग करें। पूजन करते समय यह भाव रखना चाहिए कि हमारे सामने साक्षात सद्गुरु विराजमान हैं। सबसे पहले श्री महागणपति का आह्वान करके देशकाल का कथन (संकल्प) करना चाहिए। इसके उपरांत श्री महागणपति का पूजन करके विष्णु स्मरण करना चाहिए। इसके उपरांत सद्गुरु, अर्थात महर्षि व्यास का पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात आदि शंकराचार्य आदि का स्मरण करके, अपने संप्रदाय की परंपरा के अनुसार अपने गुरु के गुरुओं का पूजन करना चाहिए। इस समय गुरु की प्रतिमा या पादुकाओं का पूजन भी किया जाता है। इसके बाद अपने गुरु का पूजन करना चाहिए।
गुरु -शिष्य परंपरा का आदर्श : जब भी धर्म की हानि (ग्लानि) हुई है, तब धर्म की स्थापना का कार्य गुरु-शिष्य परंपरा ने ही किया है। यह दैवी परंपरा केवल गुरु और शिष्य, अध्यात्म तथा मोक्ष तक ही सीमित नहीं है, अपितु विश्व कल्याण के लिए निरंतर प्रवाहित है। गुरु-शिष्य परंपरा ने न केवल शिष्य के जीवन का कल्याण किया है, अपितु धर्म की स्थापना और राष्ट्र की रक्षा का कार्य भी किया है। आज भी परम कल्याणकारी गुरु तत्व सनातन धर्म की रक्षा के लिए, साथ ही भारत के उत्कर्ष (उन्नति) के लिए कार्यरत है। हमारा कर्तव्य यह है कि केवल परिवार तक ही सीमित सोच न रखकर राष्ट्र और धर्म के कार्य में स्वयं को समर्पित कर दें! आज हमारा हित इसी में है कि हम स्वयं को गुरु-शिष्य परंपरा के इस प्रवाह में समाहित कर लें।संदर्भ : सनातन संस्था का ग्रंथ 'त्योहार, धार्मिक उत्सव और व्रत' और 'गुरुकृपायोग'
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