सुख को पाना है

सुख को पाना है

संजय जैन

आज कदम फिर लौट गये
अपनी मातृभूमि की तरफ।
वर्षो की भाग दौड़ के बाद
लौटे शुकून पाने की तरफ।।

याद वो पल वो गालियाँ
अब मुझे सता रही है।
क्योंकि फिर से मुझे
मातृभूमि बुला रही है।।

सुख चैन खो दिये थे
काम-धाम के चक्कर में।
अब सेवा निवृति उपरांत
हमें सुख को पाना है।।

कर्म शाला से मुक्त होकर
धर्म शालाओं से जोड़ना है।
आत्म कल्याण के लिये मुझे
अब साधना करना है।।

जीवन का आखरी सत्य तो
मोक्षगति की सिर्फ प्राप्ति है।
जिसको पाने के लिए
धर्म-मार्ग पर चलना पड़ेगा।।

काल चक्र का भरोसा नही
किस तरफ मोड़ जायेगा।
पता नही अगले पल क्या
हमारे साथ हो जायेगा।।

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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