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सावन (श्रावण )

सावन (श्रावण )

जय प्रकाश कुवंर
इस साल अगर मलमास के दो ज्येष्ठ महीने न होते तो सावन शुरू होकर अब तक सावन का ग्यारह दिन बीत गया होता। हम देखें तो वैसे भी सावन का महीना हिन्दू कैलेंडर वर्ष का पांचवा महीना होता है और यह हर साल आता है। इस साल यह छठा महीना होकर आने वाला है। इसे सबसे पवित्र महीना माना जाता है। यह महीना मुख्यरूप से भगवान् शिव की पूजा, भक्ति और व्रतों के लिए जाना जाता है।
खैर जो भी हो, इस साल भी सावन महीना अगले बीस दिनों के बाद तो आएगा ही। लेकिन अभी तक मौसम जैसा चल रहा है, उसको देखकर लगता है कि अब सावन में भी कोई दिलचस्पी और उत्साह नहीं है। इतना गर्मी झेलने के बाद सावन आता भी है, तो वह बहुत आनंद नहीं दे पायेगा। एक कहावत है कि " क्या वर्षा जब कृषि सुखाने " । वही हालत इस साल की गर्मी और धूप ने आदमी का कर दिया है। आदमी बढ़ती गर्मी से ऐसे भी अधमरा हो गया है। लगता है, गर्मी और तापमान का पूरे विश्व पर असर हो रहा है। धीरे धीरे मौसम ग्लोबल रूप से बदलता जा रहा है।
पहले सावन का नाम जेहन में आने से ही मन आनंदित हो जाता था,क्योंकि सावन का महीना मधुर मनोहर होता ही था। आंखों के सामने सावन की हरियाली झलकने लगती थी। सावन का फुहार मन में एक खुशनुमा दृष्य पैदा करता था। सावन में पानी पड़ते ही खेतिहर गृहस्थ धान की रोपाई करने लगते थे। धान की रोपनी करते हुए जब मजदूरनी युवतियाँ गीत गाती थीं, तो सुनकर मन गदगद हो जाता था। पानी से खेत की क्यारियाँ, नाले, गड़हे, पोखर सब भर जाते थे। सावन का फुहार पड़ते ही मिट्टी से सोंधी सुगंध आने लगती थी। एक और बात जो हमलोगों ने देखी है, वह यह की सावन की बरसात के साथ ही धरती के अंदर से बड़े बड़े पीले रंग के मेढ़क (ढाबूस बेंग) निकल आते थे और गढे, नाले, पोखर के किनारे बैठकर अपना गर्दन फुला फुला कर टर्र् टर्र् की आवाज निकालने लगते थे। शायद यह उनका प्रणय गीत होता था जो मादा मेढ़कों को आकर्षित करता था। यह मौसम उनके मिलन और वंशवृद्धि का समय हुआ करता था। एक बार सावन भादों जैसे ही खत्म हुआ, ये पीले मेढक पुनः गायब हो जाते थे, लगता था जैसे वो पुनः धरती में समा गये हैं।
प्रकृति और समय चक्र के अनुसार सावन महीना बर्षा ऋतु के लिए जाना जाता है। इस महीने में झमाझम बारिश और चारों तरफ हरियाली तन और मन दोनों को ही शांति देती है।तब सावन की आहट से ही मौसम खुशनुमा हो जाता था। पर अब पहले जैसा सावन कहाँ है। सचमुच सब बदल गया है। अब लगता है कि सावन का आना प्रकृति का रूटिन मात्र रह गया है। फिर भी हम सब सावन महीने का इंतजार करते रहते हैं। शहर से ज्यादा ग्रामीण क्षेत्र में सावन का प्रभाव देखने को मिलता है। इस महीने में ग्रामीण क्षेत्रों में जितनी भी दूर आपकी नजर जाएगी, हरियाली ही हरियाली नजर आएगी।
शहर के अलावा हमनें ग्रामीण क्षेत्र का भी आधुनिक सावन महीना देखा है। शहर में अगर सावन कम बरसा तो, चारों तरफ कींच कींच और अगर सावन खुब बरसा तो सड़कों और गलियों में जल भराव के चलते घर से बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है। हरियाली तो कुछ गिने चुने इलाकों में पेड़ों की दिखेगी या फिर र‌ईस लोगों के घरों के गमले में दिखेगी।
इस के बिपरित ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी किसानों द्वारा खेतों में रोपे गये धान के पौधों की हरियाली तथा अन्य खरीफ फसलों की हरियाली दिख ही जाएगी। बचे खुचे पेड़ पौधों की हरियाली भी गांव देहात को अभी भी खुशनुमा बनाती हैं। हांलाकि लोगों के शहर की तरफ पलायन कर जाने एवं पेड़ों के कट जाने से इसमें भी कमी आई है।
सबसे खास बात जो आज कल ग्रामीण क्षेत्रों में भी देखने को मिल रहा है वो यह है कि गीध और गौरैया पक्षी जैसा ही, पीले बड़े आकर के मेढ़क अब सावन भादों बरसात के दिनों में भी दिखाई नहीं पड़ते हैं और न कहीं उनकी टर् टर् की आवाज सुनाई पड़ती है। अब उन मेढ़कों का कुछ अता पता नहीं लगता है। जिस तरह से गांव देहात से किसान शहर की ओर पलायन कर गए, लगता है उसी तरह वो पीले ढाबूस बेंग (मेढ़क) भी धरती में समा गए। उन्हें भी शायद यही लगता है कि अब सावन का कोई ठिकाना नहीं, किस रूप में आएगा। या तो सुखा सावन आयेगा या फिर धुंआधार बर्षा और तूफान वाला सावन आयेगा जो सब कुछ लबालब भर कर या फिर सब कुछ बहाकर लिए चला जाएगा।

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