मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा

मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा

कुमार महेंद्र
अंतरमन के नीरव सरोवर में,
प्रीत-तरंगें उठने लगीं।
मृदुल-मधुर अनुभूतियों की,
चाहत-कलियाँ खिलने लगीं।
नयन निहारें रूप तुम्हारा,
मन वीणा-सा गाने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


जन-जन के व्यवहारों में भी,
तेरे स्नेह की पड़ी भनक।
रिश्तों की गलियों में जैसे,
गूँज उठी अनुराग-खनक।
हर क्षण, हर पल, हर एक पहर में,
प्रणय-मेघ छाने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


दृष्टि, सृष्टि, दिशा, क्षितिज में,
हर ओर तेरा ही रूप।
राग, रंग, श्रृंगार, परिधान,
सब लगते तेरे अनुरूप।
अधरों पर अनायास तुम्हारा,
नाम स्वयं आने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


अंतर्मन के मृदुल घुँघरू,
मिलन-विरह के स्वर छेड़ रहे।
तेरे दर्शन की रमणीयता से,
नव-सपने आकार गढ़ रहे।
तरुण सुवास तुम्हारी पाकर,
मै तुम्हें चाहने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


चंचल चितवन की आभा से,
मन पावन हो झूम उठा।
तेरे कोमल स्पर्श-मात्र से,
सूना जीवन फूल उठा।
प्राणों के हर कोने-कोने में,
प्रेम-दीप जगमगाने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


जब से तेरी स्मित की रश्मियाँ,
मन-अंबर पर बिखर गईं।
सूनी साँसों की वीणा में,
मधुर प्रणय-धुन उतर गई।
भावों का निर्झर अंतस में,
अविरल लहराने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


स्वप्न, सलिल, शशि, नभ, तारों में,
तेरा ही विस्तार दिखे।
मंद पवन की हर थिरकन में,
तेरा सजीव आकार दिखे।
जीवन के निर्जन उपवन में,
मधुमास सुहाने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


तुमसे ही भावों की सुगंध है,
तुमसे ही मन का श्रृंगार।
तुमसे ही स्पंदित हर धड़कन,
तुमसे ही जीवन साकार।
तेरे प्रेम-स्पर्श से मेरा,
अंतरतम मुस्काने लगा।
मुझे अक्श तुम्हारा भाने लगा।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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