एक लड़की बारिश में भीगी-सी
कुमार महेंद्र
श्यामल मेघ गगन में छाए,
मंद पवन मतवाली थी।
वसुधा पर बूंदें यूँ बरसीं,
मानो बजती ताली थी।
उस मधुमास-विरह की बेला में,
प्रणय-मुग्ध नव सहेली-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
यौवन की पराकाष्ठा का
अद्भुत एक नज़ारा था।
प्रकृति का कण-कण मानो,
उस रूप पर ही वारा था।
तभी दिखी वह राहों में,
चंचल, पावन, अलबेली-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
कुंतल भीगे, अंचल भीगा,
नयनों में संकोच भरा।
सौंदर्य स्वयं साकार हुआ था,
मानो स्वर्गलोक से रूप उतरा।
बरखा की सजल फुहारों में,
वह लगती थी एकाकी-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
मुखमंडल पर बूंदें ठहरीं,
मोती-सी झिलमिला उठीं।
अधरों पर मृदु मंद मुस्कानें,
अनकही कथाएँ कह उठीं।
पग-पग पर लज्जा ठिठकी थी,
पायल झंकारे नवेली-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
वह आगे बढ़कर चली गई,
मन पर अमिट छाप छोड़ गई।
सूखे हृदय के मरुस्थल को,
प्रेम-सुधा से जोड़ गई।
उसे देखकर ऐसा लगता था,
प्रेयसी-प्रणय-सौरभ भीनी-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
भीगे मौसम की उस बेला में,
वह स्वप्निल मधुर कहानी थी।
रिमझिम, रुनझुन, रूप-राग की,
मानो सजीव निशानी थी।
अब भी स्मृतियों के आँगन में,
वह रहती प्रेम-दीवानी-सी।
एक लड़की बारिश में भीगी-सी।।
कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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