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"दुनिया का दस्तूर"

"दुनिया का दस्तूर"

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
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दुधारू गाय की दो लात भी स्वीकार होती है,
जहाँ से लाभ मिलता हो, वहीं दरकार होती है।


नज़र बस दूध पर रहती, न कोई लात गिनता है,
ग़रज़ की इस अदालत में, यही सरकार होती है।


सुनाकर कड़वी बातें भी, जो अपना काम कर जाए,
उसी की हर अदा फिर तो, बड़ी शानदार होती है।


बड़ों के सामने झुकते, यहाँ सब लोग सलीक़े से,
ग़रीबों की ज़रा सी भूल भी, दुश्वार होती है।


किसी की जेब भर जाए, तो सब गुणगान करते हैं,
चलन में उसके फिर चाहे, कोई दीवार होती है।


समय का यह चलन देखो, अजब दस्तूर जारी है,
जहाँ पर स्वार्थ पलता है, वहीं जयकार होती है।


समझ ले 'राकेश' इतना, यही संसार का क़िस्सा,
दुधारू गाय की दो लात भी, उपहार होती है।
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