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नाग सांस्कृतिक विरासत

नाग सांस्कृतिक विरासत

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय वास्तुकला, धर्म, दर्शन और लोक-संस्कृति में नागों का स्थान अत्यंत अनूठा और व्यापक है। वैदिक काल से लेकर आधुनिक युग तक, नाग केवल एक सरीसृप मात्र न रहकर दिव्य शक्ति, उर्वरता, जल, पाताल लोक और आध्यात्मिक चेतना के प्रतीक रहे हैं। भारत के प्रागैतिहासिक काल से लेकर ऐतिहासिक राजवंशों तक नाग संस्कृति का गहरा प्रभाव देखने को मिलता है। प्रस्तुत आलेख में पौराणिक संदर्भों, ऐतिहासिक साम्राज्यों, पुरातात्विक साक्ष्यों और वैश्विक कड़ियों के आधार पर नाग संस्कृति का विस्तृत विश्लेषण किया गया है।
सनातन धर्म के पुराणों (विशेषकर भागवत पुराण, विष्णु पुराण और महाभारत के आदिपर्व) के अनुसार, नागों की उत्पत्ति सृष्टि के सृजनकर्ता ब्रह्मा जी के मानस पुत्र महर्षि कश्यप से मानी गई है।।कद्रू और कश्यप का प्रसंग: प्रजापति दक्ष की पुत्री कद्रू का विवाह महर्षि कश्यप से हुआ था। कद्रू ने कश्यप ऋषि से एक हजार परम पराक्रमी पुत्रों का वरदान माँगा। परिणामस्वरूप, उन्होंने एक हजार अंडे दिए, जिनसे कालान्तर में शेषनाग, वासुकि, तक्षक, कर्कोटक और ऐरावत जैसे महाप्रतापी नागों का जन्म हुआ। कद्रू को पौराणिक ग्रंथों में 'नागमाता' के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है। आध्यात्मिक धरातल पर नाग मनुष्य के भीतर छिपी परम चेतना का प्रतीक है। योग शास्त्र में वर्णित 'कुण्डलिनी शक्ति' को रीढ़ की हड्डी के निचले हिस्से (मूलाधार चक्र) में साढ़े तीन फेरे लेकर सोई हुई एक सर्पिणी के रूप में कल्पित किया गया है। जब यह शक्ति जाग्रत होती है, तो मनुष्य मोक्ष की ओर अग्रसर होता है।
आधुनिक इतिहासकारों और नृवंशविज्ञानियों के अनुसार, 'नाग' कोई काल्पनिक प्राणी नहीं, बल्कि प्राचीन भारत की एक अत्यंत वीर, उन्नत और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध मानव जनजाति थी।।ये लोग सर्प (विशेषकर नाग/कोबरा) को अपना कुल-चिह्न मानते थे और उसकी पूजा करते थे। सिंधु घाटी सभ्यता (मोहनजोदड़ो और हड़प्पा) से प्राप्त कई मुहरों और मिट्टी के बर्तनों पर फन फैलाए हुए सर्पों और सर्प-मानवों के चित्र मिले हैं, जो यह सिद्ध करते हैं कि यह संस्कृति आर्यों के आगमन से भी प्राचीन है।
. 14 महानाग और उनका सांस्कृतिक - भारतीय वांग्मय में अनंत नागों का उल्लेख है, परंतु 14 नागों को विशेष दर्जा प्राप्त है। इनका ब्रह्मांडीय और मानवीय है । :शेषनाग (अनंत): ये कद्रू के सबसे बड़े और सात्विक पुत्र थे। इन्होंने कठोर तपस्या कर ब्रह्मा जी से संपूर्ण पृथ्वी को संतुलित रखने का वरदान माँगा। इनका अवदान सृष्टि की स्थिरता और समय चक्र (काल) को थामे रखना है। त्रेतायुग में लक्ष्मण और द्वापर में बलराम इन्हीं के अंश थे। वासुकि: भगवान शिव के परम भक्त। समुद्र मंथन की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक घटना में इन्होंने मन्दराचल पर्वत की नेती (रस्सी) बनना स्वीकार किया। इनके इस आत्मत्याग से ही देवों और असुरों को अमृत सहित 14 अमूल्य रत्न प्राप्त हुए। तक्षक: नागों के कूटनीतिक और शक्तिशाली राजा। महाभारत के अनुसार, राजा परीक्षित को डसकर इन्होंने कलयुग के पूर्ण आगमन का मार्ग प्रशस्त किया। इनका अवदान काल की अनिवार्यता और कर्मफल के सिद्धांत की स्थापना है। कर्कोटक: शिव के गण और महापराक्रमी नाग। इन्होंने राजा नल को डसकर उनका रूप बदला था, जिससे नल अपने संकटकाल (अज्ञातवास) को सुरक्षित काट सके। इनका अवदान संकटकाल में रक्षा और गुप्त विद्याओं से जुड़ा है। पद्म नाग: पूर्वोत्तर और हिमालयी क्षेत्रों के जलस्रोतों के रक्षक। इनका मुख्य अवदान सदाचार की रक्षा और वर्षा चक्र को नियमित रखना माना गया है। महापद्म: पृथ्वी की अगाध खनिज संपदा और निधियों के रक्षक। इन्हें पौराणिक भूगोल में दक्षिण दिशा का रक्षक (दिक्पाल) माना गया है।शंखनाग: कला और ध्वनि के प्रतीक। इनका अवदान साधना में नाद ब्रह्म (ध्वनि तरंगों) की शुद्धि और नकारात्मक शक्तियों का विनाश करना है।कुलिक: ज्योतिष शास्त्र में 'कालसर्प दोष' के संदर्भ में इनका नाम प्रमुखता से आता है। इनका अवदान मनुष्यों को उनके प्रारब्ध और आध्यात्मिक शुद्धि के प्रति सचेत करना है।धृतराष्ट्र नाग: सूर्यवंशीय तेज से संपन्न नाग। महाभारत काल में नागों और मानवों के बीच राजनीतिक और पारिवारिक संबंधों को सुदृढ़ करने में इनका महत्वपूर्ण योगदान था।पिंगल नाग: ज्ञान, व्याकरण और कलाओं के संरक्षक। इन्हें प्रसिद्ध छंदशास्त्र के प्रणेता 'पिंगल ऋषि' का दिव्य स्वरूप भी माना जाता है। कालिया नाग: यमुना नदी को अपने विष से दूषित करने वाला नाग। भगवान श्रीकृष्ण ने इसका दमन कर (कालिया मर्दन) इसे रमणक द्वीप भेजा। इसका अवदान प्रकृति (जल) को प्रदूषण मुक्त रखने और अहंकार के अंत का शाश्वत संदेश देना है।।अश्वसेन: राजा तक्षक के पुत्र। खांडव वन दाह के समय ये अर्जुन के बाणों से बच निकले थे। महाभारत युद्ध में इन्होंने कर्ण के अमोघ बाण पर सवार होकर अर्जुन से प्रतिशोध लेने का प्रयास किया। इनका अवदान वीरता और क्षत्रिय नीति के इतिहास को दर्शाता है।एरावत नाग: इरावती (रावी) नदी के तटवर्ती क्षेत्रों और पाताल के स्वामी। इनका अवदान जल प्रबंधन और बादलों के विद्युत घर्षण को नियंत्रित कर वर्षा कराने में सहयोग देना है।मणिभद्र (मणिक): मणियों और रत्नों के अधिपति। ये यक्ष और नाग संस्कृति के बीच के सेतु हैं। इनका अवदान आर्थिक संपन्नता, व्यापारिक सुरक्षा और रत्न-विज्ञान (Gemology) की रक्षा करना
ऐतिहासिक दृष्टिकोण से भारत के विभिन्न भू-भागों पर नागवंशी राजाओं ने सदियों तक शासन किया और यहाँ की कला, संस्कृति व वास्तुकला को समृद्ध किया। . छोटा नागपुर का नागवंश (झारखंड) - राजवंश की स्थापना 64 ईस्वी में राजा फणिमुकुट राय द्वारा की गई थी। लोककथाओं के अनुसार, वे एक नागपुत्र थे जिनकी रक्षा एक विशाल नाग ने अपने फन से की थी।: इस वंश ने छोटा नागपुर (झारखंड) में लगभग दो हजार वर्षों तक शासन किया। राजा दुर्जन साल और राजा रघुनाथ शाह इस वंश के प्रतापी राजा हुए, जिन्होंने नवरतनगढ़ में भव्य महलों और मंदिरों का निर्माण कराया। . पद्मावती और विदिशा के नाग (मध्य प्रदेश)- दूसरी से चौथी शताब्दी ईस्वी के बीच मध्य प्रदेश के ग्वालियर, विदिशा, नरवर और मथुरा के क्षेत्रों पर भारशिव नागों का शासन था। : नवनाग, वीरसेन नाग और गणपतिनाग इस वंश के प्रमुख राजा थे। कुषाणों की विदेशी सत्ता को उखाड़ फेंकने में भारशिव नागों का बहुत बड़ा योगदान था। वे अपने कंधों पर शिवलिंग धारण करते थे, जिसके कारण उन्हें 'भारशिव' कहा गया।. कश्मीर का कर्कोटक राजवंश - स्थापना और शासक: 7वीं शताब्दी (लगभग 625 ईस्वी) में दुर्लभवर्धन ने कश्मीर में कर्कोटक वंश की नींव रखी। वे स्वयं को नागराज कर्कोटक का वंशज मानते थे।।: इस वंश के सबसे प्रतापी सम्राट ललितादित्य मुक्तापीड (8वीं सदी) हुए, जिन्होंने तिब्बत से लेकर कन्नौज तक अपनी विजय पताका फहराई और कश्मीर के विश्वप्रसिद्ध 'मार्तंड सूर्य मंदिर' का निर्माण कराया। बस्तर का चिंदक नागवंश (छत्तीसगढ़) ने : 11वीं शताब्दी से 14वीं शताब्दी के दौरान छत्तीसगढ़ के बस्तर (चक्रकोट) क्षेत्र पर इनका शासन था।: नृपति भूषण और सोमेश्वर देव प्रथम इस वंश के महान शासक थे। इन्होंने बारसूर और समलूर में उत्कृष्ट नाग वास्तुकला के मंदिरों का निर्माण कराया है।
. वैश्विक संदर्भ में नाग संस्कृति - नाग पूजा केवल भारत तक सीमित नहीं थी, बल्कि प्राचीन काल में इसका विस्तार वैश्विक स्तर पर था:।कंबोडिया (ख्मेर साम्राज्य): कंबोडिया की उत्पत्ति की कथा 'कौंडिन्य' नामक भारतीय ब्राह्मण और नाग राजा की पुत्री 'सोमा' (नागिनी) के विवाह से जुड़ी है। अंगकोर वाट मंदिर की सीढ़ियों और द्वारों पर 7 और 9 फन वाले विशाल वासुकि नागों की नक्काशी इसका जीवंत प्रमाण है।: मिस्र के प्राचीन फिरौन (राजा) अपने मुकुट पर फन फैलाए हुए कोबरा सर्प की आकृति धारण करते थे, जिसे 'उरियस' कहा जाता था। यह संप्रभुता, शाही शक्ति और दैवीय संरक्षण का प्रतीक था।।मेसोअमेरिका (माया और एज़्टेक संस्कृति): मेक्सिको की प्राचीन माया सभ्यता में 'कुकुलकन' और एज़्टेक में 'क्वेटज़ालकोआट्ल' नामक देवता की पूजा होती थी, जिसका अर्थ था 'पंखों वाला सर्प' है। इन्हें बुद्धिमत्ता, वायु और सृष्टि के सृजन का देवता माना जाता था।
भारत के प्रमुख नाग मंदिर: मन्नारशाला नागराज मंदिर हरिपद, अलप्पुझा, केरल प्राचीन काल (मान्यता अनुसार भगवान परशुराम द्वारा स्थापित)। यह भारत का सबसे विशाल नाग तीर्थ है। यहाँ परिसर में 30,000 से अधिक नागों की प्रतिमाएँ हैं। इस मंदिर की मुख्य पुजारी हमेशा एक महिला (अम्मा) होती हैं।।मणियार मठ राजगीर, बिहार महाभारत कालीन संदर्भ; वर्तमान ढांचा गुप्त काल (4वीं-5वीं सदी) का है। यह एक बेलनाकार स्तूपनुमा ढांचा है। महाभारत में वर्णित 'मणि-नाग' का यह ऐतिहासिक स्थान है, जहाँ खुदाई में प्राचीन नाग-नागिनों की अनूठी मूर्तियाँ मिली थीं। कुक्के सुब्रमण्य मंदिर दक्षिण कन्नड़, कर्नाटक सन्दूर राजवंश और परवर्ती होयसल शासकों द्वारा जीर्णोद्धार। यह कुमारधारा नदी के तट पर स्थित है। यहाँ सर्पराज वासुकि की रक्षा के लिए भगवान कार्तिकेय 'सुब्रमण्य' रूप में पूजे जाते हैं। यह सर्प दोष निवारण का वैश्विक केंद्र है।।नागराज मंदिर नागरकोइल, तमिलनाडु 1000-2000 वर्ष पुराना (चेर और चोल राजाओं द्वारा संरक्षित)। यहाँ के मुख्य देवता वासुकि नागराज हैं। मंदिर के गर्भगृह की मिट्टी चमत्कारी रूप से चंदन के रंग की हो जाती है, जिसे प्रसाद के रूप में दिया जाता है।।खज्जी नाग मंदिर खजियार, चंबा, हिमाचल प्रदेश 12वीं शताब्दी ईस्वी (चंबा के राजाओं द्वारा निर्मित)। यह पहाड़ी काष्ठ (लकड़ी) स्थापत्य कला का अद्भुत उदाहरण है। यहाँ नाग देवता की मानवीय रूप में मूर्ति स्थापित है और छत पर महाभारत के युद्ध के दृश्य अंकित हैं। कपिलनाथ मंदिर (नवरतनगढ़) गुमला, झारखंड 1643 ईस्वी (नागवंशी राजा राम शाह द्वारा निर्मित)। यह छोटा नागपुर के नागवंशी राजाओं की उत्कृष्ट स्थापत्य शैली और उनकी धार्मिक सहिष्णुता का ऐतिहासिक प्रतीक है।
नाग संस्कृति केवल अंधविश्वास या भय पर आधारित पूजा नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरा वैज्ञानिक और सामाजिक संदेश छिपा । भारत एक कृषि प्रधान देश है। नाग (सर्प) खेतों में फसलों को नष्ट करने वाले चूहों और अन्य कीटों का शिकार करते हैं। इसलिए इन्हें 'क्षेत्रपाल' (खेतों का रक्षक) और किसानों का मित्र माना गया है। नाग पूजा वास्तव में जैव विविधता के संरक्षण का पर्व हैभारतीय संस्कृति में माना जाता है कि जहाँ भी शुद्ध जल के स्रोत (बावड़ी, तालाब, नदियाँ) होते हैं, वहाँ नागों का वास होता है। यह प्रतीक हमें जल स्रोतों को स्वच्छ और सुरक्षित रखने की प्रेरणा देता है। सनातन संस्कृति की यह खूबसूरती है कि उसने सिंह, वराह, और हाथी के साथ-साथ अत्यंत विषैले जीव 'नाग' को भी देवतुल्य मानकर समाज में सम्मान दिया। यह संदेश देता है कि इस सृष्टि पर प्रत्येक जीव का अपना अधिकार है और मनुष्यों को प्रकृति के साथ 'सह-अस्तित्व' (Co-existence) की भावना से रहना चाहिए।संदर्भ सूची - वेद और पुराण: महाभारत (आदिपर्व - आस्तीक पर्व), श्रीमद्भागवत महापुराण, विष्णु पुराण (नागवंश वर्णन)। , ऐतिहासिक ग्रंथ: डॉ. आर.जी. भंडारकर, 'वैष्णववाद, शैववाद और अन्य अल्पसंख्यक धार्मिक प्रणालियाँ'; डॉ. कलीमुल्लाह, 'प्राचीन भारतीय जनजातियाँ और उनका इतिहास'। पुरातात्विक रिपोर्ट: भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) - राजगीर (मणियार मठ) और नवरतनगढ़ पुरातात्विक उत्खनन रिपोर्ट।।क्षेत्रीय इतिहास: 'छोटा नागपुर का इतिहास' - जे. प्राइडक्स; 'राजतरंगिणी' (कश्मीर का इतिहास) - महाकवि कल्हण। अंतर्राष्ट्रीय संदर्भ: 'द गॉड्स ऑफ ख्मेर' (कंबोडियाई संस्कृति पर शोध ग्रंथ) और 'मेसोअमेरिकन माइथोलॉजी' (कुकुलकन सर्प देवता का इतिहास)
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