आनंदी जीवन के लिए गुरुकृपा का महत्व

संकलक : श्री संजय सिंह, सनातन संस्था
प्रस्तावना
गुरु जीवन को सही दिशा देने वाले होते हैं। जैसे श्री दत्तगुरु ने 24 गुणों को गुरु बनाया था, वैसे ही गुरु प्रत्येक व्यक्ति और प्रत्येक प्रसंग में गुण देखने की दृष्टि देते हैं। परंतु हम प्रायः स्वयं में और दूसरों में गुणों को न देखकर स्वभाव-दोष और कमियों पर ही ध्यान देते हैं। इसी कारण जीवन के आनंद के अनेक क्षणों को अनुभव करने से वंचित रह जाते हैं। वास्तव में आनंदी जीवन जीने के लिए श्री दत्तगुरु के समान प्रत्येक में गुण देखने की वृत्ति आवश्यक है। गुरुकृपायोग के अनुसार व्यक्ति के स्वभाव-दोष और अहं कैसे दूर होते हैं, तथा आनंदमय जीवन की ओर यात्रा कैसे होती है, इस विषय की जानकारी सनातन संस्था द्वारा संकलित इस लेख में प्रस्तुत है।
*गुरुकृपा का महत्व*
श्री गुरुचरित्र (13:130) में कहा गया है,
"गंगा से पाप, चंद्रमा से ताप और कल्पवृक्ष से दारिद्र्य नष्ट होता है; परंतु श्रीगुरु के दर्शन से पाप, ताप और दारिद्र्य - इन तीनों का हरण हो जाता है।"
गुरु जीव को मोक्षप्राप्ति का मार्ग दिखाते हैं। गुरुकृपा से साधक के जीवन में अंतर्मुखता, सात्त्विकता और आत्मिक आनंद उत्पन्न होता है। ईश्वर में स्वभाव-दोष और अहं नहीं होता, इसलिए ईश्वर से एकरूप होने के लिए स्वयं के स्वभाव-दोष और अहं को दूर करना आवश्यक है। साधना से मन शुद्ध होता है, सूक्ष्मदृष्टि जागृत होती है और जीवन को देखने का दृष्टिकोण सकारात्मक बनता है। यह सब गुरुकृपा से ही संभव है।
*अष्टांग साधना*
नामजप, सत्संग, सत्सेवा, सत् के लिए त्याग, निःस्वार्थ प्रेम, स्वभाव-दोष निर्मूलन, अहं-निर्मूलन और भाववृद्धि - ये गुरुकृपायोग की अष्टांग साधना के 8 चरण हैं। इससे आध्यात्मिक उन्नति होती है। "सब कुछ ईश्वर की इच्छा से हो" - यह भाव अष्टांग साधना से साधक में दृढ़ होता है।
*आज ही साधना आरंभ करें !*
युवाओं को वृद्धावस्था की प्रतीक्षा न कर तरुण अवस्था से ही साधना आरंभ करनी चाहिए; क्योंकि मनुष्य जन्म का वास्तविक उद्देश्य ईश्वरप्राप्ति ही है। वृद्धावस्था में अनेक व्याधियाँ प्रारंभ हो जाने से ध्यान उसी ओर अधिक रहता है। उस समय व्याधियों को सहन करने के लिए भी साधना आवश्यक है। गुरुकृपा के बल पर साधक आनंदमय जीवन जीने में सक्षम होता है।
*गुरुतत्त्व के चरणों में प्रार्थना*
इस प्रकार गुरुकृपायोग की अष्टांग साधना द्वारा साधक स्वभाव-दोष और अहं-निर्मूलन के माध्यम से ईश्वरप्राप्ति की दिशा में अग्रसर होकर कलियुग के अस्थिर जीवन में चिरंतन आनंद प्राप्त करता है। अतः गुरुकृपायोग केवल साधना का मार्ग नहीं, अपितु आनंदमय आदर्श जीवन जीने का सर्वोत्तम मार्ग है।अपने स्वभाव-दोष और अहं को दूर कर जीवन के प्रत्येक क्षण का वास्तविक आनंद अनुभव करना - यही गुरुकृपा है। इस गुरु पूर्णिमा के पावन पर्व पर गुरुतत्त्व के चरणों में हम प्रार्थना करते हैं -
"हे गुरुदेवजी, हमें जीवन का प्रत्येक क्षण आनंद से अनुभव करने की शक्ति दें। इसके लिए हमारे स्वभाव-दोष और अहं को दूर करने की शक्ति, तड़प और निरंतर साधना करने की प्रेरणा हमें प्रदान करें।"
संदर्भ : सच्चिदानंद परब्रह्म डॉ. जयंत आठवले जी के तेजस्वी विचार
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