नारी : शक्ति, संवेदना और* *बदलती चेतना का स्वरूप ``
संगीता सागर
नारी जन्मदात्री है, इसलिए वह शक्ति का सघन पुंज है। सृष्टि के आरंभ से ही नारी ने प्रेम और जीवन को अपनी अनिवार्यता माना है। इसी अनिवार्यता ने उसे सृजन, संरक्षण और परिवर्तन की अद्भुत शक्ति प्रदान की है। नारी के व्यक्तित्व में अनेक रूप समाहित हैं और वह जिस रूप में प्रकट होती है, उसी रूप में समाज को प्रभावित करती है।
जब नारी सृजनकर्ता बनती है, तब वह वात्सल्य और ममता की प्रतिमूर्ति बनकर माँ कहलाती है। उसके आँचल में प्रेम, त्याग और समर्पण की अनंत धारा बहती है। जब वह अपनी सुकोमल संवेदनाओं के रंग बिखेरती है, तब समूची सृष्टि सौंदर्य और प्रेम की आभा से आलोकित हो उठती है और वह प्रेयसी तथा पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित होती है। वहीं जब नारी अपने अस्तित्व और अधिकारों की रक्षा के लिए हुंकार भरती है, तब वह दुर्गा और काली का स्वरूप धारण कर लेती है और शक्ति का प्रतीक बन जाती है।
किन्तु जब नारी अपने इसी नैसर्गिक स्वरूप को भूल जाती है, तब वह स्वयं को कमजोर समझने लगती है और समाज उसे अबला कहकर पुकारने लगता है। वास्तव में नारी कभी अबला नहीं रही; परिस्थितियाँ और सामाजिक बंधन ही उसे कमजोर बनाते रहे हैं।
युगों के परिवर्तन के साथ नारी के प्रति समाज की दृष्टि भी बदलती रही है। एक समय था जब कहा गया—
"यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः"
अर्थात जहाँ नारी की पूजा होती है, वहाँ देवताओं का निवास होता है। यह भारतीय संस्कृति में नारी के उच्च स्थान का परिचायक है।
इसके बाद एक युग आया, जब नारी को श्रद्धा और त्याग की प्रतिमूर्ति मानते हुए कहा गया—
"नारी, तुम केवल श्रद्धा हो।"
फिर वह समय भी आया जब राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त ने नारी की पीड़ा को शब्द देते हुए लिखा—
"अबला जीवन हाय! तुम्हारी यही कहानी,
आँचल में है दूध और आँखों में पानी।"
यह पंक्ति उस युग की स्त्री की विवशता, संवेदनशीलता और त्याग की मार्मिक अभिव्यक्ति है। किंतु वर्तमान समय में परिस्थितियाँ बदल रही हैं। आज महिला सशक्तिकरण केवल एक नारा नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन का सशक्त आंदोलन बन चुका है। आज यह स्वीकार किया जा चुका है कि राष्ट्र का विकास आधी आबादी की भागीदारी के बिना संभव नहीं है।
समय के साथ समाज की सोच बदलती रही, परन्तु स्त्रियाँ अपने भीतर अनेक पीड़ाओं, कुंठाओं और संघर्षों को समेटे मौन बनी रहीं। अपने मन की गाँठों और भावनाओं को छिपाकर रखने का अनुशासन शायद स्त्री-मन से बेहतर कोई नहीं जानता। घर-परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाते हुए, पति और बच्चों की खुशियों पर स्वयं को न्योछावर करते हुए, उसने अपने भीतर उठते हजारों हाहाकारों को दबाए रखा।
लेकिन धीरे-धीरे यही मौन एक विद्रोह में परिवर्तित होने लगा। स्त्रियों की आँखों में सपने उगने लगे। उन्हें यह एहसास होने लगा कि मौन का अर्थ विस्मृति नहीं होता और न ही त्याग का अर्थ आत्मसमर्पण है। उन्होंने अपने अस्तित्व, अधिकार और स्वाभिमान को पहचानना शुरू किया।
आज बाहर की दुनिया बहुत कुछ पहले जैसी ही दिखाई देती है—वही प्रकृति, वही लोग, वही समाज—किन्तु नारी बदल रही है। उसके भीतर आत्मविश्वास, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का नया सूर्योदय हो रहा है। यह परिवर्तन इतनी तीव्र गति से हो रहा है कि पुरुष प्रधान समाज इसकी गहराई को पूरी तरह समझ नहीं पा रहा है।
आज की नारी केवल घर की चौखट तक सीमित नहीं है। वह विज्ञान, शिक्षा, राजनीति, साहित्य, प्रशासन, सेना, खेल और अंतरिक्ष तक अपनी प्रतिभा का परचम लहरा रही है। वह अपने अधिकारों के प्रति सजग है, अपने सपनों के प्रति प्रतिबद्ध है और अपने अस्तित्व को स्वयं परिभाषित करने का साहस रखती है।
निस्संदेह, नारी परिवर्तन के एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ वह अपनी शक्ति, संवेदना और सृजनशीलता को नए आयाम दे रही है। वह अब किसी की परछाई नहीं, बल्कि स्वयं एक स्वतंत्र पहचान है। इसलिए समाज का यह कर्तव्य है कि वह नारी को सम्मान, समान अवसर और स्वतंत्रता प्रदान करे, क्योंकि जब नारी सशक्त होगी, तभी परिवार, समाज और राष्ट्र वास्तव में समृद्ध और प्रगतिशील बन सकेगा।
संगीता सागर
मुजफ्फरपुर, बिहार
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