कहाँ होता है
:भारतका एक ब्राह्मण.संजय कुमार मिश्र"अणु"
अब ऐसा प्रेम कहाँ होता है!
हो निश्चिन्त एकांत कुंज में,
खोकर अपने तेज पुंज में,
चैन की वंशी बजा बजाकर-
अपना सारा जो श्रम खोता है!!
अब ऐसा प्रेम कहाँ होता है!!
ये आंखें लडी गडी होती है,
आशाएं भरी पडी होती है,
दिशा दिशा से स्वप्न सजाकर-
दिवस जागकर तम सोता है!!
अब ऐसा प्रेम कहाँ होता है!!
चलकर सुनी सुनी राहें,
थामें एक दूजे की बांहें,
प्रणय गीत गाते सब तजकर-
अपना संचित वह बीज बोता है!
अब ऐसा प्रेम कहाँ होता है!!
भुल गए सब हंसी ठिठोली,
छोडछाड अपनी हमजोली,
रोप आरोप सब एक दूजे पर-
रूला रूलाकर के रोता है!!
अब ऐसा प्रेम कहाँ होता है!!
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