मां
संगीता सागरमाँ मेरी प्यारी-प्यारी,
सबसे न्यारी, सबसे दुलारी।
मां है जैसे शीतल छाया,
उसकी गोद में हर सुख समाया।
सुबह-सुबह वह हमें जगाती,
हँसकर दूध-नाश्ता लाती।
माथे पर काला टीका लगाकर
बुरे नज़रों से हमें बचाती ।
जब भी मैं डर जाता हूँ,
माँ के पास ही जाता हूँ।
गलती करने पर डांट लगाती है,
फिर भी मां हमें बहुत भाती हैं।
अच्छी बातें मां सिखलाती
वीरों की गाथा हमें सुनाती।
मेहनत का महत्व समझाती
रात में लोरी गाकर हमें सुलाती।
ईश्वर का वरदान है माँ,
धरती की पहचान है माँ।
हम सबका अभिमान है माँ,
बच्चों की। जहान है माँ।
संगीता सागर
मुजफ्फरपुर, बिहार
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