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"शून्य की गोताखोरी"

"शून्य की गोताखोरी"

​ पंकज शर्मा
​अभिलाषा की उत्ताल लहरें
मन के सूने तट पर
जब टकराती हैं,
तब समय का मापदंड
छोटा पड़ जाता है,
और पिपासा
विस्तार पाती जाती है।

​जिसको पाने की आतुरता में
रातें आंखों में कटीं,
वह उपलब्धि मिलते ही
एक नया क्षितिज
सामने तन जाता है;
दौड़ कभी नहीं रुकती,
सांसें घटने लगती हैं।

​मन खोजता है एक स्पर्श,
एक निश्छल प्रेम,
एक ऐसा सहयात्री
जो शब्दहीनता को समझ सके,
जो मौन के अंतस में
छिपे हाहाकार को
सहजता से पढ़ ले।

​संसार के इस अगाध सिंधु में
सत्य के मोती की चाह में,
चेतना बार-बार
गहरे उतरती है;
क्या कोई शाश्वत सत्ता है?
यह प्रश्न अनुत्तरित ही
हवा में तैरता रहता है।

​जब-जब इस जीवन की
क्षणभंगुरता का बोध
हड्डियों तक को कंपाता है,
तब सारे भ्रम ढहते हैं,
एक शांत बोध जागता है...
और जीव स्वयं में
बुद्ध हो जाता है।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️"कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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