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"जख्मी जिगर"

"जख्मी जिगर"

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"

दर्द को दिल में बसा कर जी रहे हैं आज भी,
ज़ख़्म को अपना बना कर जी रहे हैं आज भी।

इश्क़ ने ऐसा दिया हमको अमानत का चलन,
ग़म को सीने से लगा कर जी रहे हैं आज भी।

तेरी यादों का धुआँ आँखों से उठता ही रहा,
अश्क पलकों में छुपा कर जी रहे हैं आज भी।

लोग समझे थे कि हम बिखरेंगे इक दिन टूटकर,
हौसलों को फिर जगा कर जी रहे हैं आज भी।

मौत भी आई कई बार इम्तिहाँ लेने मगर,
ज़िंदगी को मुस्कुरा कर जी रहे हैं आज भी।

'राकेश' अपने इश्क़ की बस ये निशानी है बची,
दर्द को दिल में सजा कर जी रहे हैं आज भी।
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