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दुधारू गाय की दो लात भली

दुधारू गाय की दो लात भली

डॉ अवधेश कुमार अवध

यह हिंदी के प्रचलित लोकोक्तियों में से एक है। किसी भी भाषा का क्षेत्र बहुत व्यापक होने का प्रभाव उसमें निहित लोकोक्तियों पर भी पड़ता है। इसलिए इस लोकोक्ति के भी एकाधिक रूप हैं यथा- दुधारू गाय क लातो भला तथा दुधारी गाय के लात भली.....। इस बहुचर्चित लोकोक्ति में तीन पक्ष हैं। प्रथम दुधारू गाय, दूसरा लात और तीसरा लात खाने वाला।

वैसे लातों का प्रयोग सिर्फ दुधारू गाय ही नहीं करती। इस कला पर घोड़े, गधे एवं हर तरह की गायों का अधिकार है। सिर्फ जानवर ही नहीं बल्कि कबड्डी खेलने वाला खिलाड़ी भी इस फन का उपयोग करता है। बचपन में जबरन स्कूल भेजे जाते समय बच्चे भी इस कौशल का खुलेयाम प्रयोग करते हैं। न केवल बच्चे अपितु कुछ दशक पहले तक थोड़ी सी बड़ी ग़लती होने पर मां, बाप, चाचा, ताऊ, बड़े भाई, बड़ी बहन एवं मामा, फूफा जैसे शुभचिंतक भी दो-चार लातों का उपहार बिन मांगे ही दे देते थे। विद्यार्थी को प्रदान किए जाने वाले लातों की क्वालिटी और क्वांटिटी के आधार पर स्कूल के उस्ताद की योग्यता जग जाहिर होती थी। इसीलिए तो कहते हैं कि 'लातों के भूत बातों से नहीं मानते'। घरेलू हिंसा और विद्यालयी हिंसा से संबंधित बदलते सरकारी विधानों ने मनुष्यों के लातों को हाथीपांव की तरह जकड़ लिया है। मनुष्य जाति के चंचल लात अब 'पांव भारी' सरिस हो गए हैं। रंगभूमि से लौटती महारानी कुंती के शिथिल पांव जैसे हो गए हैं अब हर जागरूक व्यक्ति के पांव इसीलिए तो लात अब के हालात में लात न रहे।

चूंकि विधान मनुष्यों ने मनुष्यों के लिए बनाए थे जो बदलते हैं और जिसे बनाते रहेंगे। इसलिए इसको मानने का दायरा भी मनुष्य तक ही सीमित है। जानवर तो पहले भी अपनी लातों का स्वामी था, अब भी है और आगे भी रहेगा। ये अलग बात है कि नियमों की अनदेखी करने वाले कुछ मनुष्य भी जानवर की जमात में दखल बनाए रखते हैं। शक्ल-सूरत से मनुष्य और स्वभाव से जानवर। ऐसे बेलगाम दो दोपाये मिलकर एक चौपाये बन ही जाते हैं।

लातों के मद्देनजर गधा और गाय में काफी समानता है जबकि घोड़ा बिल्कुल अलग, असमान। इस भेद को लात खाने वाले प्रायः जानते और समझते भी हैं। इसलिए जब लात खाने का इरादा न हो तो घोड़े के अगाड़ी और गधे के पिछाड़ी नहीं जाते। इसका ये मतलब नहीं कि गाय और गधे को एक कैटेगरी में रखा जाए। इनमें भिन्नता भी बहुत है। गधा दोलत्ती मारता है जबकि गाय एकलत्ती। गधा अपने विवेक की मात्रा के अनुरूप वक्त - बेवक्त दोलत्ती चलाने का आदी होता है जबकि गाय सिर्फ जबरन दूध दोहने के वक्त ही इस अस्त्र का प्रयोग करती है। एक और खास बात! गाय लात मारते समय बिना किसी भेदभाव के आहिस्ता से लात चलाकर अपनी अनिच्छा जाहिर करती है। वह समझाना चाहती है कि अब बस भी करो। दो- तीन बार पांव को हिलाकर संकेत देती है कि ...बस...अब बस। अंततः आज़िज़ आकर जब लात चलाती है तब भी मां-शिशु जैसा स्वाभाविक वात्सल्य का आचरण दिखता है। यह अनिच्छा समान रूप से गोपालक, दूध दोहक या अपने स्वयं के बछड़े के साथ भी प्रदर्शित होती है।

लात खाने वाला एक अलग किस्म का बहुत ही चतुर, अवसरवादी और सुजान होता है। ऐसा होना स्वाभाविक ही है क्योंकि मनुष्य स्वभाव से ही स्वार्थी प्राणी है। जलपरी और कुल्हाड़ी की कहानी लगभग हर मनुष्य के स्वभाव का निदर्शन है। इसलिए जब कोई व्यक्ति दूध दोहने के लिए गाय के पीछे जाता है तो प्राप्य दूध के परिमाण के अनुरूप अपनी सहनशीलता की संहति पहले ही सेट कर लेता है। गाय की इच्छा ज्यों-ज्यों कम होती जाती है, उस व्यक्ति की इच्छा त्यों-त्यों बढ़ती जाती है। दोनों की इच्छाओं के बीच होती है - लात। लात के हर प्रहार के साथ दूध दोहक की पुचकार बढ़ती जाती है। इतनी सहनशीलता, इतनी चेष्टा, इतनी एकाग्रता कदाचित ही किसी योगी में मिले। शायद ओशो का भी ध्यान इस लोकोक्ति पर नहीं गया होगा वरना वे 'संभोग से समाधि तक' न लिखकर 'दूध दोहन से समाधि तक' लिखकर आसन्न विवादों से परे रहते।

प्रागैतिहासिक काल से अब तक जितना गायों की चर्चा हुई है, किसी और जानवर की नहीं। गौसेवा और गौश्राप से भरा पड़ा है हमारा अतीत। गोदान और मोक्ष की प्री बुकिंग से हमारे पुराण सुशोभित हैं। कृषि प्रधान देश होने के कारण किसानों के लिए बैल सहोदर भाई की तरह होते थे। माता से भी अधिक गाय की महिमा बताई गई है। इन सबके बावजूद भी गाय को एक महत्वपूर्ण सलाह पर अमल करना चाहिए। हे गाय! जब तक तुम अमृत सरिस दूध दे रही हो तब तक चाहे जितने लात मार लो। सब सह लेंगे हम। लेकिन जब भी तुम दूध देना बंद करो तो उससे पहले अपने लातों पर ठीक से काबू कर लो। दूध नहीं तो लात नहीं। याद है न ' दुधारू गाय की दो लात भली'।

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