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"मुहब्बत एक नासूर"

"मुहब्बत एक नासूर"

रचना - डॉ. रवि शंकर मिश्र "राकेश"
तलवार पर सिर धरना पड़ेगा तुम्हें,
खुद को लाचार करना पड़ेगा तुम्हें।


ज़िंदगी ना रहेगी क़ाबिल-ए-मोहब्बत,
फिर मोहब्बत में मरना पड़ेगा तुम्हें।


इश्क़ आसान समझकर जो आए हो यहाँ,
हर क़दम इम्तिहाँ भरना पड़ेगा तुम्हें।


चाहते हो अगर नाम हो आशिक़ों में,
दर्द को भी तो ज़ेवर करना पड़ेगा तुम्हें।


सिर्फ़ लब से मोहब्बत का दावा न हो,
आग के दरिया में भी उतरना पड़ेगा तुम्हें।


राह-ए-उल्फ़त में मंज़िल मुफ़्त मिलती नहीं,
ख़ार पर भी गुज़रना पड़ेगा तुम्हें।


गर वफ़ाओं का हासिल मुकम्मल है चाहो,
अपने अहं को बिखरना पड़ेगा तुम्हें।


'राकेश' कहते हैं ये इश्क़ की बंदगी है,ख़ुद को फ़ना कर संवरना पड़ेगा तुम्हें।
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