हमसफर
अरुण दिव्यांश
ऐ मेरे हमसफर ,
तू मेरे हाथ पकड़ ।
समय होत बलवान ,
मत दिखा तू अकड़ ।।
मैं अब तेरा सहारा ,
तू मेरा सहारा अब ।
दोनों हैं छठेपन में ,
मौत बुलाए जाने कब ।।
मैं रहूॅं तुझको प्यारा ,
तू मुझको प्यारी रहो ।
मेरा कहा तुम मानो ,
तुम भी अपनी कहो ।।
बाल्य किशोर व युवा ,
प्रौढ़ वृद्ध व वयोवृद्ध ।
मानवों में महामानव ,
अनुभव ज्ञान के सिद्ध ।।
अनुभव उनका ऐसा ,
जिससे बढ़ता है ज्ञान ।
साधु संत विद्व हों जैसे ,
वयोवृद्ध वैसे महान ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )
बिहार ।
ऐ मेरे हमसफर ,
तू मेरे हाथ पकड़ ।
समय होत बलवान ,
मत दिखा तू अकड़ ।।
मैं अब तेरा सहारा ,
तू मेरा सहारा अब ।
दोनों हैं छठेपन में ,
मौत बुलाए जाने कब ।।
मैं रहूॅं तुझको प्यारा ,
तू मुझको प्यारी रहो ।
मेरा कहा तुम मानो ,
तुम भी अपनी कहो ।।
बाल्य किशोर व युवा ,
प्रौढ़ वृद्ध व वयोवृद्ध ।
मानवों में महामानव ,
अनुभव ज्ञान के सिद्ध ।।
अनुभव उनका ऐसा ,
जिससे बढ़ता है ज्ञान ।
साधु संत विद्व हों जैसे ,
वयोवृद्ध वैसे महान ।।
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