अनूठी परंपराओं वाले चार भुजाजी मन्दिर के रहस्य.jpeg)
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लेखक: आनन्द हठीला
चारभुजा एक ऐतिहासिक एवं प्राचीन हिन्दू मन्दिर है जो भारत के राजस्थान राज्य में राजसमंद ज़िले की कुम्भलगढ़ तहसील के गढब़ोर गांव में स्थित है। उदयपुर से 112 और कुम्भलगढ़ से 32 कि.मी. की दूरी के लिए मेवाड़ का जाना-माना तीर्थ स्थल हैं, जहां चारभुजा जी की बड़ी ही पौराणिक चमत्कारी प्रतिमा हैं। मेवाड़ के सांवलियाजी मंदिर, केशरियानाथ मंदिर, एकलिंगनाथ मंदिर, श्रीनाथजी मंदिर, द्धारिकाधीश मंदिर व चारभुजानाथ मंदिर सुप्रसिद्ध है।
इस मन्दिर का निर्माण राजपूत शासक गंगदेव ने करवाया था। चारभुजा के शिलालेख के अनुसार सन् 1444 ई. (वि.स. 1501 ) में खरवड़ शाखा के ठाकुर महिपाल चौहान व उसके पुत्र रावत लक्ष्मण ने इस मंदिर का जीर्णोद्धार करवाया था। एक मन्दिर में मिले शिलालेख के अनुसार यहां इस क्षेत्र का नाम "बद्री" था जो कि बद्रीनाथ से मिलता जुलता है।
पौराणिक कथा के अनुसार श्रीकृष्ण भगवान ने उद्धव को हिमालय में तपस्या कर सद्गति प्राप्त करने का आदेश देते हुए स्वयं गौलोक जाने की इच्छा जाहिर की, तब उद्धव ने कहाकि मेरा तो उद्धार हो जाएगा पंरतु आपके परमभक्त पांडव व सुदामा तो आपके गौलोक जाने की खबर सुनकर प्राण त्याग देंगे। ऐसे में श्रीकृष्ण ने विश्वकर्मा से स्वयं व बलराम की मूर्तियां बनवाई, जिसे राजा इन्द्र को देकर कहा कि ये मूर्तियां पांडव युधिष्ठिर व सुदामा को सुपुर्द करके उन्हें कहना कि ये दोनों मूर्तियां मेरी है और मैं ही इनमें हूं। प्रेम से इन मूर्तियों का पूजन करते रहें, कलयुग में मेरे दर्शन व पूजा करते रहने से मैं मनुष्यों की इच्छा पूर्ण करूंगा। इन्द्र देवता ने श्रीकृष्ण की मूर्ति सुदामा को प्रदान की और पांडव व सुदामा इन मूर्तियों की पूजा करने लगे। वर्तमान में गढ़बोर में चारभुजा जी के नाम से स्थित प्रतिमा पांडवो द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति और सुदामा द्वारा पूजी जाने वाली मूर्ति सत्यनारायण के नाम से सेवंत्री गांव में स्थित है। कहा जाता है कि पांडवो ने हिमालय जाने से पूर्व मूर्ति को जलमग्न करके गए थे ताकि इसकी पवित्रता को कोई खंडित न कर सके।
गढ़बोर के तत्कालीन राजपूत शासक गंगदेव को चारभुजानाथ ने सपने में आकर आदेश दिया कि पानी में से निकालकर मूर्ति मंदिर बनाकर स्थापित करो। राजा ने ऐसा ही किया, उसने जल से प्राप्त मूर्ति को मंदिर में स्थापित करवा दी। कहा जाता है कि मुगलों के अत्याचारों को देखते हुए मूर्ति को कई बार जलमग्न रखा गया है। महाराणा मेवाड़ ने चारभुजानाथ के मंदिर को व्यवस्थित कराया था। कहा जाता है कि एक बार मेवाड़ महाराणा उदयपुर से यहां दर्शन को आए लेकिन देर हो जाने से पुजारी देवा ने भगवान चारभुजा का शयन करा दिया और हमेशा महाराणा को दी जाने वाली भगवान की माला खुद पहन ली। इसी समय महाराणा वहां आ गए। माला में सफेद बाल देखकर पुजारी से पूछा कि क्या भगवान बूढे़ होने लगे है? पुजारी ने घबराते हुए हां कह दिया। महाराणा ने जांच का आदेश दे दिया। दूसरे दिन भगवान के केशों में से एक केश सफेद दिखाई दिया। इसे ऊपर से चिपकाया गया केश मानकर जब उसे उखाडा़ गया तो श्रीविग्रह (मूर्ति) से रक्त की बूंदें निकल पड़ी। इस तरह भक्त देवा की भगवान ने लाज रख दी। उसी रात्रि को महाराणा ने सपना देखा जिसमें भगवान ने कह दिया कि भविष्य में कोई भी महाराणा दर्शन के लिए गढ़बोर न आवे तब से पंरपरा का निर्वाह हो रहा है, यहां मेवाड़ महाराणा नहीं आते है। लेकिन महाराणा बनने से पूर्व युवराज के अधिकार से इस मंदिर पर आकर जरूर दर्शन करते है और फिर महाराणा की पदवी ली जाती है।
इसी गढ़बोर पर कभी रावत-राजपूत नाम से पहचान रखने वाले क्षत्रियों के पूर्वज विहलजी चौहान के अनूठे शौर्य पर मेवाड़ के शासक रावल जैतसी ने विहलजी को रावत का खिताब व गढ़बोर का राज्य इनाम में दिया था। आज भी विहलजी चौहान का दुर्ग चारभुजा से सेवंत्रीे जाने वाले मार्ग पर खण्डहर हालात में विद्यमान है।
मेवाड़ और मारवाड़ के आराध्य चारभुजानाथ (गढ़बोर) मंदिर की परंपराएं और सेवा-पूजा की मर्यादाएं भी अनूठी हैं। करीब 5285 साल पहले पांडवों के हाथों स्थापित इस मंदिर में कृष्ण का चतुर्भुज स्वरूप विराजित है। यहां के पुजारी गुर्जर समाज के 1000 परिवार हैं।इनमें सेवा-पूजा ओसरे के अनुसार बंटी हुई है।
ओसरे की परंपरा ऐसी है कि कुछ परिवारों का ओसरा जीवन में सिर्फ एक बार (48 से 50 साल में) तो किसी को चार साल के अंतराल मेंआता है। हर अमावस्या को ओसरा बदलता है और अगला परिवार मुख्य पुजारी बनता है। ओसरे का निर्धारण बरसों पहले गोत्र और परिवारों की संख्या के अनुसार हुआ था, जो अब भी चल रहा है। अभी ओसरा पुजारी भरत गुर्जर के परिवार का चल रहा है, मंदिर के गर्भगृह में पुजारी परिवार के अलावा किसी को जाने को अनुमति नहीं होती।
ओसरा चलने तक मंदिर में ही रहते हैं पुजारी, परिवार में मौत हो तब भी नहीं जा सकते ।ओसरे के दौरान पाट पर बैठ चुके पुजारी को एक महीने के कठिन तप, मर्यादाओं में रहना पड़ता है। ओसरा चलने तक पुजारी घर नहीं जा सकते हैं, उन्हें मंदिर में ही रहना पड़ता है। परिवार या सगे-संबंधियों में मौत होने पर भी पूजा का दायित्व निभाना होता है। किसी भी कारण से मर्यादा भंग होने पर पुजारी स्नान कर नई धोती पहनते हैं। पूजा के ओसरे में एक महीने हर प्रकार के व्यसन से दूर रहने, बदन पर साबुन नहीं लगाने, ब्रह्मचर्य पालन की मर्यादाएं निभाते हैं। भगवान की रसोई में ओसरा निभाने वाले परिवार द्वारा चांदी के कलश में लाया जल ही काम में लिया जाता है। फागोत्सव में पंद्रह दिन और जलझूलनी पर कुछ दिन सोने के कलश में जल लाया जाता है।
चारभुजानाथ में दिनभर में पांच दर्शन होते हैं। मंगला में मक्खन, राजभोग में केसरिया भात, लापसी, सादा चावल, शाम को कसार, दूध का प्रसाद चढ़ता है।मंदिर के बारे में ये भी रोचक शंख, चक्र, गदा, ढाल-तलवार, भाला ठाकुरजी को धारण कराये जाते हैं। शृंगार में मोर मुकुट, बंशी सहित रत्नजड़ित मालाओं का आभूषण धारण कराये जाते है सुबह 8 बजे से शाम 7.30 बजे तक खुले रहते हैं दर्शन। जन्माष्टमी पर भगवान के पोतड़े धोने की परंपरा निभाई जाती है। मान्यता है कि प्रतिमा स्थापना के बाद पांडवों ने बद्रीनाथ में जाकर तन त्यागा था।
गढ़बोर में चारभुजानाथ का प्रतिवर्ष भाद्रपद मास की एकादशी (जलझुलनी एकादशी) को विशाल मेला लगता है। चारभुजा गढ़बोर में हर वर्ष लाखो श्रद्धालु दर्शन करने आते है। यहां पर आने वाले भक्तों की मनोकामना पूरी होती है।
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