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नाथ और योगी संप्रदाय: उद्भव

नाथ और योगी संप्रदाय: उद्भव

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय आध्यात्मिक वांग्मय में 'नाथ संप्रदाय' और 'योगी (जोगी) संप्रदाय' अंतश्चेतना को जाग्रत करने वाली एक अत्यंत प्रभावशाली और जीवंत परंपरा रहे हैं। यह संप्रदाय केवल कंदराओं में बैठकर समाधि लगाने वाले साधुओं का समूह मात्र नहीं है, बल्कि इसने भारत के सामाजिक, सांस्कृतिक, भाषाई और दार्शनिक परिदृश्य को आमूलचूल परिवर्तित किया है। तात्विक रूप से 'नाथ' और 'योगी' संप्रदाय एक ही सिक्के के दो पहलू हैं—जहाँ 'नाथ' इस पंथ की दार्शनिक प्रतिष्ठा और गुरु-परंपरा को दर्शाता है, वहीं 'योगी' या 'जोगी' इसके व्यावहारिक स्वरूप और साधकों के क्रियात्मक जीवन का परिचायक है।
नाथ और योगी संप्रदाय की स्थापना के इतिहास को समझने के लिए हमें इसे दो दृष्टिकोणों से देखना होगा:
धार्मिक ग्रंथों और संप्रदाय की आंतरिक मान्यताओं के अनुसार, इस संप्रदाय के आदि-प्रवर्तक स्वयं भगवान शिव हैं, जिन्हें 'आदिनाथ' कहा जाता है। 'नाथ चरित' और 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' के अनुसार, सृष्टि के प्रारंभ में भगवान शिव ने योग और तंत्र के जिन गूढ़ रहस्यों का प्रतिपादन माता पार्वती के समक्ष किया था, वही ज्ञान परंपरा आगे चलकर धरा पर प्रवाहित हुई। इस दृष्टि से यह संप्रदाय अनादि और शाश्वत है
ऐतिहासिक धरातल पर नाथ संप्रदाय को एक सुव्यवस्थित आंदोलन के रूप में स्थापित करने का श्रेय 9वीं-10वीं शताब्दी में गुरु मच्छिंद्रनाथ (मत्स्येन्द्रनाथ) और उनके महान शिष्य महायोगी गोरखनाथ (गोरक्षनाथ) को जाता है। मच्छिंद्रनाथ ने तांत्रिक साधनाओं को परिष्कृत कर लोक-कल्याण के मार्ग पर मोड़ा है। गुरु गोरखनाथ (11वीं-12वीं शताब्दी) ने इस संप्रदाय को अखिल भारतीय स्तर पर संगठित किया। उन्होंने देश के विभिन्न अंचलों में बिखरे हुए योगियों, सिद्धों और साधकों को एक सूत्र में पिरोकर 'बारह पंथी योगी संप्रदाय' की नींव रखी। गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) इस संप्रदाय का केंद्रीय पीठ बना है। नाथ परंपरा में 'नवनाथों' को शिव का अवतार और अजन्मा माना गया है। लोक-कल्याण के लिए समय-समय पर उनका प्राकट्य विभिन्न अद्भुत माध्यमों से हुआ, जो प्रतीकात्मक रूप से प्रकृति और पंचतत्वों पर उनके नियंत्रण को दर्शाता है:।मच्छिंद्रनाथ (मत्स्येन्द्रनाथ): इनका प्राकट्य मछली के उदर से माना जाता है। सागर की तरंगों के बीच शिव-पार्वती के संवाद को श्रवण करने के कारण इन्हें आदिज्ञान प्राप्त हुआ। ये योग और तंत्र के आदि-व्याख्याता हैं।।गोरखनाथ (गोरक्षनाथ): गुरु मच्छिंद्रनाथ के आशीर्वाद स्वरूप एक कल्याणी स्त्री को दी गई भस्म से, बारह वर्ष बाद गोबर के ढेर से इनका प्राकट्य हुआ। 'गोरक्ष' का अर्थ है इंद्रियों की रक्षा करने वाला। ये परम जितेंद्रिय और संगठनकर्ता थे।।जालंधरनाथ: इनका प्राकट्य यज्ञ कुंड के पवित्र जल या अंतरिक्ष से माना जाता है। इनका प्रभाव उत्तर-पश्चिम भारत में सर्वाधिक था।।कनीफनाथ (कानिफनाथ): हाथी के कर्ण (कान) से प्रकट होने के कारण इन्हें कनीफनाथ कहा गया। यह प्रतीकात्मक रूप से श्रवण-साधना (नादानुसंधान) की पराकाष्ठा को दर्शाता है। ये तंत्र विद्या के प्रखर ज्ञाता थे। गाहिनीनाथ (गहिनीनाथ): इनका प्राकट्य नदी तट या कीचड़ (कमल की भांति) से माना जाता है। ये करुणा और औषधि ज्ञान के सागर थे। भर्तृहरिनाथ: ये उज्जैन के प्रतापी परमारवंशी राजा थे, जो अपनी रानी पिंगला के वियोग और संसार की नश्वरता को देखकर वैराग्य की ओर प्रवृत्त हुए और गोरखनाथ के शिष्य बने।।रेवणनाथ: रेवा (नर्मदा) नदी के पावन तट पर प्रकट होने के कारण इनका नाम रेवणनाथ पड़ा। इन्होंने दक्षिण भारत में सिद्धियों का प्रसार किया।।चर्पटनाथ (चर्पटीनाथ): रसायनों और धातुओं से दिव्य औषधियां बनाने की कला (रस-विद्या) के चमत्कार से इनका प्राकट्य संबद्ध है। नागनाथ: इन्हें नागवंशी शक्तियों का प्रतीक माना जाता है, जिन्होंने 'नाग योग' और कुंडलिनी जागरण के रहस्यों को प्रतिपादित किया। भौगोलिक विस्तार और महासिद्धों की कर्मभूमि - नाथ पंथ के संतों ने 'रमता जोगी बहता पानी' के सिद्धांत को जिया। उन्होंने किसी एक स्थान को अपनी सीमा नहीं बनाया, बल्कि संपूर्ण अखंड भारत और उसके पार भी अपनी कर्मभूमि का विस्तार किया:
नाथ संत प्रमुख साधना स्थल एवं कर्मभूमि (भौगोलिक क्षेत्र) में 1 मच्छिंद्रनाथ कामरूप (असम), बंगाल, नेपाल (काठमांडू घाटी) और चंद्रगिरि (दक्षिण भारत)। 2 गोरखनाथ गोरखपुर (उत्तर प्रदेश), टिल्ला जोगियां (झेलम, वर्तमान पाकिस्तान), कछार (गुजरात), कांगड़ा (हिमाचल) और नेपाल।।3 जालंधरनाथ जालंधर (पंजाब), कांगड़ा घाटी, और राजस्थान के मरुस्थलीय क्षेत्र। 4 कनीफनाथ मढ़ी (अहमदनगर, महाराष्ट्र), बंगाल और पूर्वी भारत के तांत्रिक क्षेत्र।।5 गाहिनीनाथ नारायणगढ़, चिंचवड (महाराष्ट्र) और गोदावरी नदी का तटवर्ती क्षेत्र। 6 भर्तृहरिनाथ उज्जैन (मध्य प्रदेश), सरिस्का की गुफाएं (राजस्थान) और चुनारगढ़ (उत्तर प्रदेश)। 7 रेवणनाथ विटा-सांगली (महाराष्ट्र) और बीजापुर (कर्नाटक) सहित संपूर्ण दक्षिण भारत। 8 चर्पटनाथ चंबा रियासत (हिमाचल प्रदेश) और तिब्बत की सीमा से लगे हिमालयी क्षेत्र। 9 नागनाथ औंढा नागनाथ (हिंगोली, महाराष्ट्र) और श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) है।


इतिहासकारों में डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी और डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल) के अनुसार, नवनाथों का मुख्य सक्रियता काल 8वीं शताब्दी से 13वीं शताब्दी के मध्य रहा है। यह भारतीय इतिहास का वह संधिकाल था जब देश राजनीतिक अस्थिरता और विदेशी आक्रमणों का सामना कर रहा था। इस काल में नाथों ने निम्नलिखित साम्राज्यों के समांतर लोक-चेतना को दिशा दी: पाल और सेन राजवंश (पूर्वी भारत): मच्छिंद्रनाथ और कनीफनाथ का समय बंगाल के पाल राजाओं (जैसे राजा गोपीचंद) के समकालीन था। यहाँ बौद्ध धर्म की बज्रयान शाखा और नाथ पंथ का गहरा अंतर्संबंध स्थापित हुआ। महाराष्ट्र में यादव राजाओं के शासनकाल में गाहिनीनाथ और गोरखनाथ का व्यापक प्रभाव था। गाहिनीनाथ ने ही संत निवृत्तिनाथ को दीक्षा दी, जिन्होंने आगे चलकर संत ज्ञानेश्वर के माध्यम से 'वारकरी संप्रदाय' की नींव रखी। परमार और प्रतिहार राजवंश (मध्य भारत): राजा भर्तृहरि का संबंध उज्जैन के परमार वंश से माना जाता है, जो कला और संस्कृति के महान संरक्षक थे। तुर्क आक्रमण का काल (उत्तर भारत): राजा पृथ्वीराज चौहान के समय और उसके ठीक बाद, जब उत्तर भारत में महमूद गजनवी और मोहम्मद गोरी के आक्रमणों से हिंदू समाज बिखर रहा था, तब गुरु गोरखनाथ ने जाति-पाति से ऊपर उठकर एक सुदृढ़ आध्यात्मिक रक्षा-कवच तैयार किया।
नाथ संप्रदाय का अवदान केवल धार्मिक दीक्षा तक सीमित नहीं था। उन्होंने राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने को पुनर्जीवित करने में युगांतरकारी भूमिका निभाई हैं । भगवान पतंजलि के राजयोग को जनसाधारण के लिए सुलभ बनाने का श्रेय नाथों को है। उन्होंने 'हठयोग' (ह = सूर्य/प्राण, ठ = चंद्र/अपान) का प्रतिपादन किया। गुरु गोरखनाथ कृत 'गोरक्ष संहिता', 'सिद्ध सिद्धांत पद्धति' और बाद में इसी परंपरा में लिखे गए 'हठयोग प्रदीपिका' तथा 'घेरंड संहिता' जैसे ग्रंथ आज पूरे विश्व में योग विज्ञान के प्रामाणिक आधार हैं। प्राणायाम, षटकर्म, मुद्रा और नादानुसंधान की व्यावहारिक विधियां नाथ पंथ की ही देन है।
मध्यकाल में जब समाज छुआछूत, जातिगत संकीर्णता और खोखले कर्मकांडों में जकड़ा हुआ था, तब नाथ संप्रदाय ने घोषणा की कि परमात्मा की भक्ति पर किसी एक वर्ग का एकाधिकार नहीं है। उन्होंने अंत्यज (पिछड़े) और शोषित समाज को गले लगाया। दीक्षा के समय कान छिदवाकर स्फटिक के कुंडल (मुद्रा) धारण करने के कारण इन्हें 'कानफटा जोगी' कहा गया, जिसमें राजा और रंक का भेद समाप्त हो जाता था। संत कबीर, गुरु नानक देव और संत ज्ञानेश्वर के साहित्य पर नाथों की विचार-सरणि का स्पष्ट प्रभाव दिखाई देता है।
नाथ संप्रदाय के संतों, विशेषकर चर्पटनाथ और गाहिनीनाथ ने पारे (पारद), गंधक और विभिन्न धातुओं के शोधन से 'भस्म' और दिव्य औषधियां बनाने की 'रस-विद्या' को चरमोत्कर्ष पर पहुँचाया। उन्होंने वनों और कंदराओं में रहकर जड़ी-बूटियों के माध्यम से ऐसी चिकित्सा प्रणालियाँ विकसित कीं, जो असाध्य रोगों को दूर करने में सक्षम थीं। लोक-कल्याण के लिए चिकित्सा को अध्यात्म से जोड़ना उनका महान अवदान है।
नाथों ने अपने उपदेशों के लिए संस्कृत की क्लिष्टता को छोड़कर लोकभाषाओं (अपभ्रंश, सधुक्कड़ी, देशभाषा और पुरानी हिंदी/मराठी) को चुना। गुरु गोरखनाथ की 'सबदियां' और 'पद' हिंदी साहित्य के आदिकाल की अमूल्य धरोहर हैं। उन्होंने समाज को सीधे संवाद की भाषा दी, जिसने आगे चलकर भक्ति आंदोलन की पीठिका तैयार की।।नाथ संप्रदाय ने भारत की भौगोलिक सीमाओं को एक अनूठे सांस्कृतिक सूत्र में पिरोया। एक नाथ योगी उत्तर के टिल्ला जोगियां से चलकर दक्षिण के श्रीशैलम तक और पूर्व के कामरूप से पश्चिम के द्वारका-कछार तक निर्बाध यात्रा करता था। इस 'विरासत यात्रा' ने भारत को एक संप्रभु सांस्कृतिक राष्ट्र के रूप में जीवित रखा। नेपाल और भारत के सांस्कृतिक संबंधों की प्रगाढ़ता में गुरु गोरखनाथ और मच्छिंद्रनाथ का स्थान सर्वोपरि है। नवनाथों द्वारा स्थापित और पोषित नाथ एवं योगी संप्रदाय भारतीय संस्कृति का वह अक्षय वटवृक्ष है जिसकी जड़ें आदिनाथ शिव में हैं और शाखाएं वैश्विक धरातल पर योग के रूप में फैली हुई हैं। उन्होंने तंत्र को अश्लीलता से निकालकर लोक-कल्याण की साधना बनाया, योग को महलों से निकालकर झोपड़ियों तक पहुँचाया और समाज को समरसता का पाठ पढ़ाया। आज भी इस संप्रदाय के मंदिर, धुनियाँ, आश्रम और 'अलख निरंजन' का उद्घोष हमें आंतरिक शुचिता, शारीरिक स्वास्थ्य और आध्यात्मिक उन्नति की ओर अग्रसर होने की निरंतर प्रेरणा देते हैं।
संदर्भ ग्- नाथ संप्रदाय — डॉ. हजारीप्रसाद द्विवेदी ,गोरखबानी — डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ,सिद्ध सिद्धांत पद्धति — महायोगी गोरखनाथ ,नाथ लीलामत ।


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