Advertisment1

यह एक धर्मिक और राष्ट्रवादी पत्रिका है जो पाठको के आपसी सहयोग के द्वारा प्रकाशित किया जाता है अपना सहयोग हमारे इस खाते में जमा करने का कष्ट करें | आप का छोटा सहयोग भी हमारे लिए लाखों के बराबर होगा |

प्रकृति और अध्यात्म का महामिलन: सावन मास

प्रकृति और अध्यात्म का महामिलन: सावन मास

सत्येन्द्र कुमार पाठक
सनातन हिंदू संस्कृति में 'काल' (समय) को केवल एक रेखीय गति नहीं, बल्कि एक चक्र माना गया है। इस काल-चक्र को संचालित करने के लिए पंचांग की व्यवस्था की गई है, जिसमें बारह महीनों को प्रकृति, खगोल, चेतना और मानव स्वभाव के अनुसार विभाजित किया गया है। इन बारह महीनों में 'श्रावण मास' (सावन) को सर्वश्रेष्ठ, सबसे पवित्र और आध्यात्मिक रूप से सर्वाधिक ऊर्जावान माना गया है। सावन केवल एक महीना नहीं है; यह ज्येष्ठ और आषाढ़ की तपन के बाद धरती को मिलने वाला नवजीवन है, यह भगवान शिव के वैराग्य और मां पार्वती के अनुराग का मिलन बिंदु है, यह ऋषियों के ज्ञान की पुनरावृत्ति है और यह भारतीय उपमहाद्वीप के कृषि जीवन का प्राण है। सतयुग से लेकर आधुनिक 21वीं सदी के भारत तक, और वेदों की ऋचाओं से लेकर लोक-गीतों की कजरी तक, सावन का इतिहास अत्यंत प्राचीन, समृद्ध और बहुआयामी रहा है।
श्रावण मास के गूढ़ रहस्य को समझने के लिए सबसे पहले 'श्रावणी' के स्वरूप को समझना आवश्यक है। पौराणिक कथाओं, तंत्र ग्रंथों और लोक परंपराओं में 'श्रावणी' शब्द किसी एक पात्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके तीन अत्यंत महत्वपूर्ण संदर्भ मिलते हैं:
शिव पुराण और उत्तर भारत ( मिथिलांचल) की लोक कथाओं के अनुसार, सावन मास का नागों से अटूट संबंध है। एक बार जब भगवान शिव और माता पार्वती सरोवर में जलक्रीड़ा कर रहे थे, तब महादेव का तेज स्खलित हुआ। लोक मान्यताओं के अनुसार, उस तेज को एक सर्पिणी ने कमल के पत्ते के रूप में धारण किया, जिससे पाँच अत्यंत सुंदर नागकन्याओं का जन्म हुआ। इनके नाम थे—जया, विषहरी, शामिलबारी (पद्मवती), देव और दोतली। पुत्री के रूप में स्वीकार्यता: चूंकि इनका जन्म श्रावण मास की ऊर्जा से हुआ था और ये महादेव के अंश से उत्पन्न थीं, इसलिए इन्हें 'श्रावणी' या 'श्रावणी शक्तियां' कहा गया। जब माता पार्वती को इनकी उत्पत्ति का पता चला, तो वे क्रोधित हुईं और इन्हें समाप्त करना चाहा। तब शिवजी ने उन्हें रोका और बताया कि ये उनकी अत्यंत प्रिय मानस पुत्रियाँ हैं। वरदान और नागपंचमी: महादेव ने इन पाँचों को वरदान दिया कि जो भी श्रावण मास में, विशेषकर शुक्ल पक्ष की पंचमी (नागपंचमी) को इन नागकन्याओं और नागदेवता की पूजा करेगा, उसे जीवन में कभी सर्पभय नहीं सताएगा और उसकी आध्यात्मिक उन्नति होगी। इस प्रकार 'श्रावणी' शिव की प्रिय पुत्री के रूप में प्रतिष्ठित है।
तंत्र विज्ञान और शक्ति संप्रदाय (शाक्त मत) में 'श्रावणी' को साक्षात आदिशक्ति माना गया है। शक्तिपीठ का इतिहास: 'तंत्र चूड़ामणि' के अनुसार, जब भगवान शिव सती के मृत शरीर को लेकर तांडव कर रहे थे और विष्णु जी ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के अंग काटे, तब कन्याकुमारी के सुदूर दक्षिणी तट पर सती का पृष्ठ भाग या कंधा (जिसे संस्कृत के कुछ ग्रंथों में 'श्रावण भाग' कहा गया है) गिरा था। वहां स्थापित शक्ति को 'श्रावणी शक्तिपीठ' कहा जाता है, जहाँ शिव 'निमिष' रूप में और देवी 'श्रावणी' रूप में पूजी जाती हैं। माता पार्वती का कठोर तप: दूसरे जन्म में माता पार्वती ने भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए सावन के पूरे महीने अन्न-जल का त्याग कर कठोर उपवास किया था। सावन की पूर्णिमा को ही उनका यह संकल्प पूर्णता की ओर बढ़ा था। अतः पत्नी रूप में भी वे सावन की अधिष्ठात्री देवी हैं। श्रावण मास की पूर्णता (श्रावणी पूर्णिमा) पर ब्रह्मा, विष्णु और महेश तीनों की संयुक्त कृपा बरसती है: भगवान विष्णु की प्रिय: यह महीना 'श्रवण' नक्षत्र से जुड़ा है, जिसके स्वामी स्वयं भगवान विष्णु हैं। इसी महीने में विष्णु जी 'वामन' अवतार लेकर राजा बलि का उद्धार करते हैं। ब्रह्मा जी की प्रिय: ब्रह्मा जी के मानस पुत्रों(सप्तऋषियों) ने इसी मास में वेदों के संकलन और ऋचाओं के सस्वर पाठ को पुनर्जीवित किया था। शिव की प्रिय: समुद्र मंथन के दौरान जब हलाहल विष निकला, तब सृष्टि को बचाने के लिए शिव ने उसे अपने कंठ में धारण किया। विष की ज्वाला को शांत करने के लिए ब्रह्मा और विष्णु सहित सभी देवताओं ने उन पर गंगाजल चढ़ाया। शीतल जल मिलने से शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और उन्होंने घोषणा की कि यह महीना उन्हें वर्ष में सबसे प्रिय होगा।
सनातन संस्कृति के चार महान कालखंडों—सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग में सावन के महीने ने नए-नए ऐतिहासिक और आध्यात्मिक आयामों को जोड़ा है। सतयुग: वामन अवतार & बलि , [त्रेतायुग: श्रीराम की कांवड़ यात्रा , [द्वापरयुग: कृष्ण & रक्षासूत्र] , कलियुग: वैश्विक कांवड़ & लोकपर्व है।
सतयुग में श्रावण मास का संबंध भगवान विष्णु के वामन अवतार और असुर राज बलि से जुड़ता है। राजा बलि ने जब तीन लोकों पर अधिकार कर लिया, तब भगवान विष्णु ने वामन रूप धरकर सावन के महीने में ही तीन पग में पूरी सृष्टि नाप ली थी। जब बलि ने अपना सब कुछ दान कर दिया, तब भगवान ने उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर उसे पाताल लोक का राजा बनाया और स्वयं उसके द्वारपाल बने। माता लक्ष्मी ने सावन की पूर्णिमा को राजा बलि की कलाई पर रक्षासूत्र (राखी) बांधकर अपने पति (भगवान विष्णु) को वापस मांगा था। यहीं से रक्षाबंधन और श्रावणी पूर्णिमा की अमर परंपरा शुरू हुई। . त्रेतायुग: मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम और प्रथम कांवड़ यात्रा है। त्रेतायुग में सावन का महीना भक्ति आंदोलन के एक बहुत बड़े आधार के रूप में उभरा। इसी युग में कांवड़ यात्रा का प्रादुर्भाव हुआ। पौराणिक इतिहास के अनुसार, आनंद रामायण में वर्णन मिलता है कि भगवान श्रीराम ने सावन के महीने में बिहार के सुल्तानगंज से उत्तरवाहिनी गंगा का पवित्र जल अपनी कांवड़ में भरा था। वे वहां से कई सौ मील पैदल चलकर झारखंड के देवघर पहुंचे और वहां स्थापित ज्योतिर्लिंग (बाबा बैद्यनाथ) पर जल अर्पित किया। श्रीराम द्वारा स्थापित यह परंपरा आज भी करोड़ों लोगों के लिए अगाध श्रद्धा का केंद्र है। इसी युग में माता-पिता की सेवा के प्रतीक 'श्रवण कुमार' की कथा भी घटित होती है, जिनका नाम सावन के सेवा भाव को प्रदर्शित करता है।
द्वापरयुग में सावन का महीना उत्सव और सखा-भाव का गवाह बना। भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रज में सावन के महीने में 'झूला उत्सव' (हिंडोला) की शुरुआत की, जो आज भी भारत के सभी वैष्णव मंदिरों में बड़े धूमधाम से मनाया जाता है। महाभारत काल में, जब पांडव जुए में अपना सब कुछ हारकर वन-वन भटक रहे थे, तब भगवान कृष्ण के कहने पर द्रौपदी ने पांडवों की रक्षा और विजय के लिए सावन के पवित्र दिनों में उपवास रखा था और उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधा था। वर्तमान कलियुग में सावन का महीना आम जनमानस के लिए एक ढाल की तरह है। मानसिक तनाव, भौतिकतावादी अंधी दौड़ और कलयुग के विकारों से मुक्ति के लिए लोग सावन के सोमवार का व्रत रखते हैं। आज यह मास सामूहिक साधना, उपवास, संकीर्तन और प्रकृति के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करने का सबसे बड़ा माध्यम बन चुका है। सनातन संस्कृति की दूरदर्शिता देखिए कि उसने मानव समाज के मनोवैज्ञानिक और व्यावहारिक संतुलन के लिए चार प्रमुख वर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र) की आध्यात्मिक ऊर्जा को वर्ष के चार अलग-अलग महीनों और त्योहारों के साथ जोड़ा है। इसका उद्देश्य समाज के हर वर्ग को मानसिक शांति और समाज में समानता का भाव है।
ब्राह्मण का मुख्य कर्तव्य ज्ञान का अर्जन और वितरण है। सावन का महीना (विशेषकर श्रावणी पूर्णिमा) ब्राह्मणों के लिए वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन 'श्रावणी उपकर्म' या 'उपाकर्म' किया जाता है। ब्राह्मण नदियों के तट पर जाकर पंचगव्य से आत्म-शुद्धि करते हैं, अपने पुराने यज्ञोपवीत (जनेऊ) को बदलकर नया जनेऊ धारण करते हैं, और पिछले वर्ष के पापों का प्रायश्चित कर नए शैक्षणिक सत्र (वेदारंभ) की शुरुआत करते हैं। यह बौद्धिक पुनर्जागरण का पर्व है। क्षत्रिय का धर्म समाज और राष्ट्र की रक्षा करना है। इसके लिए अगाध शक्ति और मानसिक दृढ़ता की आवश्यकता होती है। इसलिए आश्विन मास के 'शारदीय नवरात्र' और 'विजयादशमी' (दशहरा) को क्षत्रियों के लिए समर्पित किया गया है। इस दिन वे शस्त्र पूजा (Ayudha Puja) करते हैं, शक्ति की उपासना करते हैं और विजय यात्रा करते है। वैश्य वर्ण समाज की अर्थव्यवस्था, व्यापार और कृषि उपज के वितरण का उत्तरदायित्व संभालता है। कार्तिक मास की अमावस्या (दीपावली) वैश्यों के लिए नए वित्तीय वर्ष, बहीखातों के पूजन और महालक्ष्मी व कुबेर की आराधना का समय है। इस समय तक खरीफ की फसल घर आ जाती है और व्यापार में लक्ष्मी का आगमन होता है।
शूद्र वर्ण समाज का आधार स्तंभ है, जो अपने कठोर श्रम और सेवा से पूरी व्यवस्था को चलाता है। इस कृषक और श्रमिक वर्ग के कठिन परिश्रम के बाद जब वसंत ऋतु में फसलें पककर तैयार होती हैं, तब फाल्गुन मास में 'होली' का पर्व आता है। होली को इस वर्ग के लिए इसलिए समर्पित माना गया है क्योंकि यह त्योहार ऊंच-नीच, जाति-पांत के सभी बंधनों को तोड़कर, अमीर-गरीब सबको गुलाल के एक ही रंग में रंग देता है। यह सामाजिक समरसता और श्रम के उल्लास का उत्सव है।
भारत में समय-समय पर विभिन्न उपासना पद्धतियों और संप्रदायों का विकास हुआ। इन सभी संप्रदायों ने प्रकृति और ब्रह्मांड की चाल को देखते हुए अलग-अलग महीनों को अपनी साधना का केंद्र बनाया: चैत्र मास: सौर संस्कृति (सूर्य की उपासना करने वाले) के लिए चैत्र मास नववर्ष का प्रतीक है क्योंकि इस समय सूर्य मेष राशि में प्रवेश करते हैं। वैष्णवों के लिए यह इसलिए पवित्र है क्योंकि इसी मास में मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का जन्म हुआ था। कार्तिक मास: इस महीने में सूर्य तुला राशि में होते हैं। वैष्णव मत में इसे 'दामोदर मास' कहा जाता है। इस पूरे महीने में तुलसी पूजा, आकाशदीप दान और कार्तिक स्नान का महत्व है। इसी महीने में बिहार और उत्तर भारत में सूर्य उपासना का सबसे बड़ा महापर्व 'छठ पूजा' मनाया जाता है, जो सौर संस्कृति का सर्वोत्तम उदाहरण है।
सनातन कैलेंडर पूर्णतः चंद्रमा पर आधारित है। सावन का महीना चंद्रमा की उच्च स्थिति को दर्शाता है। चूंकि चंद्रमा भगवान शिव के मस्तक पर 'चंद्रशेखर' के रूप में सुशोभित हैं, इसलिए चंद्रमा के दोषों से मुक्ति पाने के लिए सावन के सोमवार को चंद्र देव की विशेष पूजा की जाती है। शरद पूर्णिमा और श्रावण पूर्णिमा चंद्र संस्कृति के दो मुख्य स्तंभ हैं।
शक्ति की उपासना करने वालों के लिए वर्ष के दो महीने सबसे महत्वपूर्ण हैं—आश्विन (शारदीय नवरात्र) और चैत्र (वासंतिक नवरात्र)। इन महीनों में ऋतु परिवर्तन होता है (यमदंष्ट्र काल), जिससे शरीर और ब्रह्मांड में ऊर्जा का असंतुलन होता है। शाक्त साधक इस समय व्रत रखकर ब्रह्मांडीय ऊर्जा (Aura) को शुद्ध करते हैं।
श्रावण मास (सावन): यह महीना शैव संस्कृति का हृदय है। वर्षा की बूंदों के रूप में प्रकृति स्वयं महादेव का निरंतर अभिषेक करती है। इसके साथ ही, यह ऋषियों की ज्ञान परंपरा (ऋषि संस्कृति) और नागों के सम्मान (पारिस्थितिकी संतुलन) का पर्व है। फाल्गुन मास: इस महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि आती है। यदि सावन शिव के सगुण और आनंदमयी स्वरूप का प्रतीक है, तो फाल्गुन उनकी असीम चेतना, वैराग्य और महा-कल्याणकारी रूप का प्रतीक है। सावन मास के दौरान होने वाले आयोजनों, मेलों और यात्राओं को केवल धार्मिक गुरुओं ने ही नहीं, बल्कि भारत के महान राजवंशों ने भी संरक्षण दिया। मौर्य काल से लेकर आधुनिक काल तक इसका ऐतिहासिक विवरण इस प्रकार है:
मौर्य काल (322–185 ईसा पूर्व): सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य और विशेषकर बौद्ध धर्म अपनाने के बाद सम्राट अशोक के शासनकाल में, सावन मास से शुरू होने वाले 'चातुर्मास' (चार महीने का वर्षाकाल) के दौरान राजकीय यात्राएं रोक दी जाती थीं। मौर्य साम्राज्य की सेनाएं इस समय युद्ध विराम रखती थीं और जल संचयन व पर्यावरण संरक्षण के राजकीय आदेश जारी किए जाते थे।
गुप्त काल (320–550 ईस्वी): गुप्त काल को सनातन संस्कृति का 'स्वर्ण युग' कहा जाता है। इस काल के राजाओं (जैसे चंद्रगुप्त विक्रमादित्य और समुद्रगुप्त) ने शिव और विष्णु के मंदिरों का बड़े पैमाने पर निर्माण कराया। सावन के महीने में होने वाली कांवड़ यात्रा और कालिदास द्वारा रचित 'मेघदूतम्' में सावन के बादलों का जो वर्णन है, उसे इसी काल में साहित्यिक और सामाजिक मान्यता मिली।
बंगाल और बिहार के क्षेत्रों में राज करने वाले पाल और सेन राजाओं के काल में सावन के महीने को एक नया आयाम मिला। सेन राजाओं ने (जो स्वयं परम शैव थे) देवघर के वैद्यनाथ मंदिर और उत्तर भारत के अन्य शिव मंदिरों को प्रचुर दान दिया। इसी काल में 'मधुश्रावणी' जैसे कठिन व्रतों को लोक-संस्कृति का अभिन्न हिस्सा बनाया गया, जिससे नवविवाहिताओं में पारिवारिक मूल्यों का संचार था ।
मुगल काल में भी भारत की सांस्कृतिक जड़े इतनी गहरी थीं कि वे मुस्लिम शासकों के दरबारों तक पहुंचीं। सावन के महीने में गाया जाने वाला 'कजरी' संगीत, 'मल्हार' और बागों में झूले डालने की परंपरा अवध के नवाबों और मुगल शाहजादियों के महलों का हिस्सा बनी। अकबर और शाहजहाँ के काल में ब्रज और काशी के 'श्रावणी मेलों' को राजकीय हस्तक्षेप से दूर रखकर सुरक्षा प्रदान की जाती थी, जिससे व्यापार फलता-फूलता था।
ब्रिटिश काल (1858–1947): अंग्रेजों के समय सावन के मेलों को प्रबंधित करने के लिए रेलवे और स्थानीय प्रशासन ने पहली बार लिखित नियम बनाए। सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक घटना वर्ष 1905 में घटी, जब अंग्रेजों ने 'बंगाल विभाजन' (बंगाली समाज को बांटने) का प्रयास किया। तब रवींद्रनाथ टैगोर ने सावन की पूर्णिमा (रक्षाबंधन) के दिन को 'राखी उत्सव' के रूप में मनाया। उन्होंने हिंदुओं और मुसलमानों से एक-दूसरे की कलाई पर राखी बांधने का आह्वान किया, जिससे सावन का यह धार्मिक पर्व ब्रिटिश सत्ता के खिलाफ राष्ट्रीय एकता और स्वतंत्रता आंदोलन का एक बहुत बड़ा हथियार बन गया।
आधुनिक युग (21वीं सदी): आज सावन एक वैश्विक घटना बन चुका है। भारत सरकार और विभिन्न राज्य सरकारें (उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, उत्तराखंड) कांवड़ यात्रा के लिए हेलीकॉप्टर से फूलों की वर्षा कराती हैं, सड़कों को सुगम बनाती हैं और चिकित्सा शिविर लगाती हैं। इंटरनेट और सोशल मीडिया के इस दौर में सावन के भजन, रील और वीडियो दुनिया भर में भारतीय संस्कृति का डंका बजा रहे हैं।
सावन का महीना केवल सनातनी हिंदुओं तक सीमित नहीं रहा, बल्कि भारत भूमि पर जनमे अन्य धर्मों और विदेशी यात्रियों ने भी इस समय की प्राकृतिक और आध्यात्मिक भव्यता को स्वीकार किया है:
बौद्ध धर्म और 'वर्षावास' (Vassa): महात्मा बुद्ध ने अपने भिक्षुओं के लिए नियम बनाया था कि सावन मास से शुरू होने वाले तीन महीनों के वर्षाकाल में वे कहीं यात्रा नहीं करेंगे। इसे 'वर्षावास' कहा जाता है। इस दौरान बौद्ध भिक्षु एक ही विहार में रहकर कठिन साधना, ध्यान और धम्म का संकलन करते हैं।
जैन धर्म और 'चातुर्मास': जैन धर्म में अहिंसा को परम धर्म माना गया है। सावन के महीने में बारिश के कारण जमीन पर अनगिनत सूक्ष्म जीव और वनस्पति उत्पन्न होते हैं। जैन मुनि इस समय अपनी पदयात्राएं रोक देते हैं ताकि उनके पैरों के नीचे आकर किसी जीव की हत्या न हो। इसी काल में जैनियों का सबसे पवित्र पर्व 'पर्युषण पर्व' आता है, जो आत्म-शुद्धि और क्षमावाणी का समय है।
सिख धर्म और 'बारहमासा': सिख धर्म के पवित्र ग्रंथ 'श्री गुरु ग्रंथ साहिब' में गुरु अर्जुन देव जी ने 'बारहमासा' (बारह महीनों का आध्यात्मिक वर्णन) के अंतर्गत सावन महीने की बड़ी सुंदर व्याख्या की है। गुरु साहिब लिखते हैं: "सावणु सरसी कामणी चरन कंवल सिउ पिआरु।" अर्थात, सावन का महीना आते ही आत्मा रूपी स्त्री आनंदित हो उठती है, जब उसका प्रेम ईश्वर के चरण कमलों से जुड़ जाता है। जैसे वर्षा की बूंदें सूखी धरती को तृप्त करती हैं, वैसे ही हरि का नाम तड़पती हुई आत्मा को शांति देता है। विदेशी यात्री और अन्य संस्कृतियाँ: प्राचीन काल में भारत आए यूनानी (यवन) राजदूत मेगस्थनीज, चीनी यात्री ह्वेनसांग और फाह्यान ने अपने यात्रा वृत्तांतों में भारत के मानसून और इस दौरान नदियों के किनारे होने वाले ऋषियों के सम्मेलनों और दीपदान के उत्सवों का विस्मयकारी वर्णन किया है। प्रकृति के स्तर पर, सावन का यह समय मिस्र की नील नदी के उत्सवों और प्राचीन मेसोपोटामिया की 'उर्वरता की पूजा' (Fertility Rituals) से मेल खाता है, जो यह दर्शाता है कि यह मास वैश्विक चेतना से जुड़ा है।
अतः गहरे विश्लेषण के बाद यह स्पष्ट होता है कि श्रावण मास (सावन) केवल कैलेंडर की कुछ तिथियों या अंधविश्वासों का पुलिंदा नहीं है। यह भारत की उस महान वैज्ञानिक और दार्शनिक सोच का परिणाम है, जहाँ धर्म को प्रकृति के साथ जोड़ दिया गया है।।सावन हमें सिखाता है कि: त्याग और लोक-कल्याण: जैसे शिव ने विष पीकर संसार को बचाया, वैसे ही हमें भी समाज के कल्याण के लिए अपने अहंकार का विष पीना चाहिए।
प्रकृति का संरक्षण: नागों की पूजा, वृक्षों पर झूले और नदियों के जल से अभिषेक हमें याद दिलाता है कि हमारा अस्तित्व इस पर्यावरण, जल और जीव-जंतुओं के सुरक्षित रहने पर ही निर्भर है। सामाजिक समरसता: कांवड़ यात्रा में अमीर-गरीब, राजा-रंक सब 'बम-बम भोले' के एक ही जयकारे के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलते हैं। यहाँ सारे सामाजिक भेद समाप्त हो जाते हैं।सावन मास सतयुग के त्याग, त्रेता की भक्ति, द्वापर के उत्सव, साम्राज्यों के इतिहास और आधुनिक युग की आस्था का वह महासागर है, जिसमें डूबकर हर भारतीय मानस पवित्र और ऊर्जस्वित हो जाता है। यह सनातन संस्कृति का वह अमर और शाश्वत गौरव है, जो आदि से अनंत तक अबाधित बहता रहेगा।
"ॐ नमः शिवाय"
हमारे खबरों को शेयर करना न भूलें| हमारे फेसबुक पेज से जुड़े https://www.facebook.com/divyarashmimag हमारे यूटूब चैनल से अवश्य जुड़ें https://www.youtube.com/divyarashminews हमें ट्विटर पर फॉलो करे :- https://x.com/DivyaRashmi8

एक टिप्पणी भेजें

0 टिप्पणियाँ