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खुदको दौहराता है

खुदको दौहराता है

संजय जैन

बहुत दुख होता है मुझको
अपनी खुदकी जिंदगी पर।
तरस बहुत आता है मुझको
खुदकी अपनी करनी पर।।

जब से घर को छोड़ हूँ।
तब से घर नही लौट पाया हूँ।
आगे पढ़ने के चक्कर में मैंने।
घर परिवार को खो दिया।।

इज्जत सोहरत खूब मिल रही
पर अपने कर्तव्यों से दूर रहा।
न तो सुख दुख अपनों का मैं
संग रहकर कभी बाँट सका।।

जिन्होंने मुझको पैदा किया
उनको भी मैं सुख न दे सका।
मैं अपने में मस्त होकर के
ऊँची उड़ाने भरता रहा।।

आपार वैभव और दौलत को
दिन प्रति दिन बढ़ाता रहा।
पर दो पल भी जिंदगी के
अपने माँ बाप संग न बाँट सका।।

अपनी जुबान से मेरे माँ बाप
सदा हमारी तारीफ करते है।
पर अंदर के अपने दर्द को
वो किसी से नही कहते है।।

मेरे बेटे बहू ने देखो तो
कितना नाम कमान लिया।
अपने माँ बाप और परिवार का
कितना नाम रोशन किया।।

जब मैं चिंतन दिलसे करता हूँ।
तो सब कुछ गलत लगता है।
मैंने अपने जीवन में अब तक
माँ बाप के लिए क्या किया।।

जिन्होंने अपना पेट काटकर
अपनी इच्छाओं को मार कर।
मुझको तो काबिल बना दिया।
पर क्या मैं कर पाया उनके लिए।।

आज मुझे एहसास हो रहा
जब मेरे बेटे वही दौहरा रहे।
तब मुझको वो सब कुछ अब
आँखों के समाने दिखा रहा।।

जय जिनेंद्र
संजय जैन "बीना" मुंबई
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