गोकर्ण और धुंधकारी की कथा एवं श्रीमद्भागवत महापुराण कथा का महत्व।
जय प्रकाश कुवंर
हिन्दू धर्म में कुछ ऐसे महान ग्रंथ हैं, जिनके केन्द्र में भगवान् श्री कृष्ण हैं। इनमें मुख्यतः श्रीमद्भागवतगीता और श्रीमद्भागवत महापुराण हैं। श्रीमद्भागवत महापुराण ग्रंथ हिन्दू धर्म के अठारह महापुराणों में सबसे प्रमुख और श्रेष्ठ माना जाता है।
श्रीमद्भागवतगीता मूल रूप से भगवान् श्री कृष्ण और अर्जुन के संवाद से उपजा मनुष्य को जीवन जीने का दर्शन और ज्ञान है, जबकि श्रीमद्भागवत महापुराण पूरी तरह से भगवान् कृष्ण की भक्ति, उनकी बाल और दिव्य लीलाओं, उनके विभिन्न अवतारों और भक्तों की महिमा पर केन्द्रित है। यह हमें भगवान् के प्रति अटूट प्रेम और भक्ति प्राप्त करना सिखाता है।
गोकर्ण और धुंधकारी की कथा श्रीमद्भागवत महापुराण के महात्म्य में वर्णित एक अत्यंत प्रेरणादायक और मार्मिक कहानी है। यह कथा दर्शाती है कि भगवान् का कथा प्रसंग तथा सत्संग सुनना एवं भगवान् की भक्ति का प्रभाव मनुष्य के सबसे गहरे पापों और प्रेतयोनि से भी मुक्ति दिला सकता है।
तुंगभद्रा नदी के तट पर आत्मदेव नाम के एक विद्वान ब्राह्मण रहते थे। वो समस्त वेदों के ज्ञाता थे और उनका तेज सूर्य के समान था। उनकी पत्नी धुंधुली वैसे तो देखने में सुंदर थी लेकिन बहुत झगड़ालू और क्रूर स्वभाव की थी। समय के साथ वे बृद्ध हो गये लेकिन उन्हें कोई संतान नहीं हुई। यहाँ तक उनका दुर्भाग्य था कि उनके अपने पाले हुए गाय को भी कोई संतान नहीं था। घर में हमेशा कलह और कोई संतान नहीं होने के कारण आत्मदेव बहुत दुखी रहते थे।
एक दिन अपना प्राण त्याग देने के इरादे से आत्मदेव जंगल की ओर निकल पड़े। जंगल में उन्हें एक संत से मुलाकात हुई, जिन्होंने आत्मदेव से उनके चिंता का कारण पुछा। सब जानकर उस संत की कृपा से उन्हें एक फल की प्राप्ति हुई, जिसे उनकी पत्नी को खिला देने से एक गुणवान पुत्र की प्राप्ति होती। संत द्वारा दिए गए उस फल के साथ वहाँ से घर लौट कर आने के बाद उन्होंने उस फल को अपने पत्नी को खाने के लिए दिया। लेकिन उनकी पत्नी धुंधुली ने उस फल को धोखे से अपनी गाय को खिला दिया। धुंधुली की बहन उन दिनों एक अवैध संबंध से गर्भवती थी, जिसे उसने बच्चे के जन्म होने पर अपनी बहन धुंधुली को दे देने के लिए वादा किया और तब तक अपने पेट पर कपड़ा लत्ता बांध कर गर्भवती होने का नाटक करने के लिए अपनी बहन धुंधुली को परामर्श दिया। अपने ही घर में पत्नी द्वारा रचे गए षणयंत्र का आत्मदेव को कुछ भी पता नहीं चला।
समय पूरा होने पर आत्मदेव की गाय ने एक अत्यंत ज्ञानी बालक को जन्म दिया, जिसके कान गाय जैसे थे। अत: उस बालक का नाम गोकर्ण रखा गया। बड़े होने पर गोकर्ण ने वेदों का ज्ञान प्राप्त किया और धर्म के मार्ग पर चलने वाला महान ज्ञानी और महात्मा बना। उधर धुंधुली की बहन ने एक अवैध बच्चे को जन्म दिया, जिसे उसने अपनी बहन धुंधुली को दे दिया और यह घोषणा कर दी कि उसे एक मृत बच्चा पैदा हुआ जिसे फेंक दिया गया।
धुंधुली ने अपने बच्चे का नाम धुंधकारी रखा। धुंधकारी बचपन से ही क्रोधी और पापी था। बड़ा होकर धुंधकारी चोर, शराबी, जुआरी और वेश्यागमन करने वाला बन गया। उसने घर की सारी संपत्ति वेश्याओं पर लुटा दिया और माता पिता के साथ मार पीट करने लगा। उसके रात दिन अशांति फैलाने के चलते आत्मदेव जी गोकर्ण के सलाह पर जंगल में तपस्या और भगवान् का भजन करने चले गए। और अंत में मृत्यु को प्राप्त कर श्री चरणों में गमन कर गए। इधर गोकर्ण भी घर की हालत से तंग आकर तीर्थ यात्रा के लिए चले गए। अब घर में माता को अकेला पाकर धुंधकारी और दुर्व्यवहार करने लगा तथा घर के सारे गहने वेश्याओं को दे दिया। माता धुंधली जब मार खाते तंग हो गई तो उसने कुएं में डूब कर आत्महत्या कर ली।
अब धुंधकारी के साथ पांच वेश्याओं का दल उसके घर में ही रहने लगीं। अत्यधिक लालचवश उसका सारा पैसा आदि हड़प लेने के बाद वेश्याओं ने धुंधकारी को रस्सियों में बांधकर पहले खुब मारा पीटा और फिर जिंदा जला कर मार डाला तथा उसके घर में ही मृत शरीर को दफना दिया और सब कुछ लेकर निकल गयीं।
अपने कुकर्मो और अकाल मृत्यु के कारण धुंधकारी मरने के बाद प्रेतयोनि में पड़कर अनेक कष्ट भोगने लगा तथा उसकी प्रेतात्मा वहीं आस पास भटकने लगी।
गोकर्ण जब तीर्थ यात्रा से लौटे तो सारी बातों की उनको जानकारी हुई। फिर उन्होंने धुंधकारी की आत्मा की शांति के लिए पिंडदान किया तथा तीर्थों में मंत्र अनुष्ठान किया। धुंधकारी गोकर्ण को देखते ही प्रेत रूप में प्रगट होकर उनसे मदद के लिए इशारा किया तथा अपने प्रेतयोनि से उद्धार के लिए निवेदन किया। गोकर्ण ने सूर्य देव से विनम्र निवेदन किया तो उन्होंने बताया कि सात दिन तक श्रीमद्भागवत का नियम पूर्वक पाठ करने से और श्रद्धा पूर्वक सुनने से सुनने वाले की मुक्ति हो जाएगी।
सूर्य देव की आज्ञा से गोकर्ण ने स्वयं श्रीमद्भागवत कथा सुनाई। गोकर्ण हर रोज समय पर आकर सात गांठ वाले बांस पर वायु रूप में बैठकर श्रद्धा से कथा सुनता। हर रोज कथा के अंत में बांस की एक गांठ टूट जाती थी। कथा की पूर्ण समाप्ति पर सातवें दिन जब बांस की सातवीं गांठ भी टूट गई तब धुंधकारी दिव्य रूप में प्रगट हुआ। उसने अपने भैया गोकर्ण से बोला अब मैं श्रीमद्भागवत कथा के श्रवण से प्रेतयोनि से मुक्त होकर भगवद् पार्षद बन गया हूँ।
सात दिन तक श्रीमद्भागवत कथा प्रेम और श्रद्धा पूर्वक सुनने से धुंधकारी प्रेतयोनि से मुक्ति पाकर दिव्य विमान में बैठकर बैकुण्ठ धाम चला गया।
अतः यह माना जाता है कि सात दिनों तक सच्चे मन से प्रेम और श्रद्धा पूर्वक श्रीमद्भागवत कथा सुनने और स्मरण करने से भले ही कोई चाहे जितना भी बड़ा पापी क्यों न हो , उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
जय श्री कृष्ण 🙏🙏
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