प्यार करने चले हो तो
अरुण दिव्यांशप्यार करने चली हो तुम ,
प्यार को तो पहचान लो ।
क्या हो तुम औ कैसी हो ,
खुद को तुम तो जान लो ।।
बहुत हुए हैं मजनूॅं आज ,
बहुत हुई हैं आज लैला ।
कहीं लैला आज मैली है ,
कहीं मजनूॅं भी तो मैला ।।
कहीं हत्या होत मजनूॅं की ,
कहीं मारी जाती है लैला ।
लैला मजनूॅं हैं साफ नहीं ,
चाहे लैला हों या छैला ।।
लैला मजनूॅं भी खूब हुए हैं ,
लैला मजनूॅं की यह रैला ।
लैला का मन करैला है तो ,
मजनूॅं भी हुआ है विषैला ।।
जिसने इनको पाला पोषा ,
उनके तो ये हुए ही नहीं है ।
जिसने इन्हें हृदय लगाया ,
फिर भी संग जुड़े नहीं हैं ।।
प्यार का राग बुरा है होता ,
बहुत बुरा प्यार का आग ।
झूठी कसमें दोनों खाकर ,
मातपिता तज जाते भाग ।।
प्यार की आग दोनों झुलसे ,
दोनों के चरित लगते दाग ।
एक की जब होती है हत्या ,
तो दूसरा जेल खेले फाग ।।
लैला मजनूॅं दोनों सॅंभलो ,
जीवन से कर तू बैर नहीं ।
जीवन को दाग से बचा लो ,
अन्यथा तेरा है खैर नहीं ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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