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तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान

तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान

कुमार महेंद्र
नक्षत्रों का वैभव फीका,
फीकी शशि की उजली रात।
मुग्ध प्रकृति भी मौन खड़ी है,
सुनकर तुम्हारी मधुर बात।
स्वर्ण-किरण की कांति ठहरी,
रुक गया उषा का मधुर गान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


कालिदास की दिव्य उपमाओं की,
सीमा यहाँ समाप्त हुई।
तुम्हारी आँखों की गहराई में,
प्रणय सरिता व्याप्त हुई।
संगमरमर का गर्व झुका है,
लज्जित है पुष्पित मधुवन-प्राण।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


तुम्हारी एक हँसी से जागे,
जग में नव विश्वास।
कमल-दलों से कोमल अधरों पर,
बिखरा मधुमय हास।
काव्य-जगत की समस्त विधाएँ,
त्याग चुकी अपना अभिमान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


तुम सादगी की चरम विभूति,
तुम ही श्रृंगार की शान।
तुमसे पाकर अर्थ जगत में,
सुंदरता पाती पहचान।
रूप-सुधा के अक्षय सरोवर,
तुम अनुपम सौंदर्य-निधान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


केश-मेघ जब लहराते हैं,
सावन भी शरमा जाता है।
मलय-पवन का चंचल झोंका,
तुमको छूकर गुनगुनाता है।
हिरणी-सी चपल तुम्हारी चाल,
मोहित होता सकल जहान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


चित्रकार की तूलिका थककर,
रंगों का विस्तार भूल गई।
मूर्तिकार की साध अधूरी,
कल्पना भी राह भूल गई।
तुमको गढ़ते समय विधाता ने,
रखा होगा पूरा ध्यान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


रंभा, उर्वशी, मेनका का,
वैभव भी क्षीण पड़ जाए ।
तुम्हारे रूप-सरोवर आगे,
शशि भी लज्जा से झुक जाए।
सृष्टि-सौंदर्य का सार समेटे,
तुम हो ईश्वर का वरदान।
तुम्हारे आगे फीके, सौंदर्य के प्रतिमान।।


कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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