झोंक दो उस प्यार को अग्नि में
अरुण दिव्यांशझोंक दो उस प्यार को अग्नि में ,
तुम्हें जो लैला - मजनूॅं बना दे ।
उजड़ने से जीवन को बचा लो ,
नहीं मिथ्या वह प्यार घना दे ।।
मन को निज नियंत्रित कर लो ,
मन को अपने तू ऐसे मना ले ।
चुन ले चबेना हेतु चना तू ऐसे ,
सुंदर सुदृढ़ मन तो ये बना ले ।।
लग जाए मस्तक ये आग नहीं ,
लग जाए जीवन तेरे दाग नहीं ।
हो जीवन तेरा ये शर्मसार नहीं ,
गिरे पितु शीश का पाग नहीं ।।
प्यार अजगर विषधर नाग बड़ा ,
मन पर पहरा तो बैठा दो कड़ा ।
डॅंस न ले यह नाग जीवन को ,
जीवन को पीड़ित होना पड़ा ।।
पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण ) बिहार ।
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