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पिता

पिता

अरुण दिव्यांश

नित निज जो पित्त जलाता ,
पित्त जला पुत्र को जगाता ,
अंबर सा जो बनता छाया ,
वही तो है पिता कहलाता ।
अपने हेतु जो नहीं है जिता ,
पुत्र हेतु जो गम को है पीता ,
होने न देता माॅं का अहसास ,
वही समझता भगवद्गीता ।
पिता प्रीत का महाबंधन है ,
पिता जीत का अवलंबन है ,
भूल गया जो पिता का पता ,
उसके जीवन में ही क्रंदन है ।
माता जिनकी ये धरती माता ,
पिता जिनके ये आसमान है ,
पुत्र का जीवन धन्य धन्य है ,
पूर्ण होता उनका अरमान है ।
जिसने समझा मातपिता को ,
बुजुर्गों का है सत्कार किया ,
वाणी जिनकी होत सुमधुर ,
ईश से ही साक्षात्कार किया ।

पूर्णतः मौलिक एवं
अप्रकाशित रचना
अरुण दिव्यांश
छपरा ( सारण )बिहार ।
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