हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम
कुमार महेंद्रमेवाड़ की आन-बान के प्रहरी,
स्वाभिमान के थे प्रतिमान।
जिनकी रणहुंकार सुनकर,
काँप उठता था शत्रु-अभिमान।
वीरता के अमर पुंज बन,
मुगलों में मचाया कोहराम।
हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम।।
प्राणों से बढ़कर प्रिय थी जिनको,
मेवाड़ी माटी की सौगंध।
राष्ट्रधर्म की रक्षा खातिर,
सह ली विपदाएँ अनंत।
त्याग, तपस्या, धर्मनिष्ठा से,
व्यक्तित्व रहा भारत-ललाम।
हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम।।
अरावली की कंदराओं में,
स्वाधीनता का दीप जलाया।
घास की रोटी खाकर भी,
पराधीनता को न अपनाया।
भारत माँ के सच्चे लाल,
शौर्य-शक्ति के पावन धाम।
हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम।।
हल्दीघाटी के रण में जिसने,
शौर्य का इतिहास रचा।
चेतक संग अद्भुत पराक्रम,
वीरता का नव दीप सजा।
राष्ट्रगौरव के अमिट प्रतीक,
यश-कीर्ति बहती अविराम।
हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम।।
एकलिंग के परम उपासक,
धर्म, धैर्य और शक्ति-पर्याय।
धूल चटाकर मुगलों को,
लिखा स्वर्णिम विजय-अध्याय।
भारत-भूमि पर अमर रहेगा,
कीका तेरा गौरवमय नाम।
हे हिन्दुआ सूरज, तुम्हें साष्टांग प्रणाम।।
कुमार महेंद्र(स्वरचित मौलिक रचना)
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