"तृष्णा एवं संतोष का सत्य"
पंकज शर्मा
प्रिय मित्रों धन जीवन की आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन है, किंतु जब वह स्वयं लक्ष्य बन जाता है, तब मनुष्य अंतहीन इच्छाओं के जाल में उलझ जाता है। संपदा का आकर्षण क्षणिक तृप्ति तो देता है, परंतु उसके साथ नई आकांक्षाएँ भी जन्म लेती हैं। इस प्रकार बाह्य समृद्धि बढ़ती है, किंतु अंतर्मन का रिक्त स्थान यथावत बना रहता है।
वास्तविक समृद्धि धन-संचय में नहीं, बल्कि संतोष एवं आत्मसंयम में निहित है। तृष्णा का स्रोत अभाव नहीं, अपितु आसक्ति है; इसलिए इच्छाओं की पूर्ति से अधिक आवश्यक उनका परिमार्जन है। जो व्यक्ति अपनी कामनाओं का स्वामी बन जाता है, वही जीवन के सच्चे वैभव का अधिकारी होता है। संतोष ही वह अमृत है जो मनुष्य को भीतर से पूर्ण एवं शांत बनाता है।
. "सनातन"
(एक सोच , प्रेरणा और संस्कार)
पंकज शर्मा (कमल सनातनी)
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