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राजगीर की पर्वत श्रृंखला और सांस्कृतिक विरासत

राजगीर की पर्वत श्रृंखला और सांस्कृतिक विरासत

सत्येन्द्र कुमार पाठक
भारतीय उपमहाद्वीप के इतिहास में मगध साम्राज्य का उदय एक युगांतकारी घटना थी। इस साम्राज्य को स्थायित्व और अभेद्यता प्रदान करने में इसकी प्रथम राजधानी 'राजगृह' (राजगीर) की भौगोलिक बनावट का सबसे बड़ा योगदान था। चारों ओर से ऊँची और दुर्गम पहाड़ियों से घिरी घाटी में बसा यह नगर एक प्राकृतिक जल-दुर्ग और गिरि-दुर्ग का सर्वोत्तम उदाहरण है। पौराणिक ग्रंथों में जहाँ इसे सम्राट जरासंध की राजधानी के रूप में प्रतिष्ठा मिली, वहीं ऐतिहासिक कालखंड में यह भगवान बुद्ध और भगवान महावीर की मुख्य कर्मभूमि बना। राजगीर की विशेषता यह है कि यहाँ की प्रकृति और यहाँ का इतिहास एक-दूसरे में इस प्रकार घुले-मिले हैं कि यहाँ का प्रत्येक पत्थर और प्रत्येक जलधारा एक प्राचीन गाथा सुनाती प्रतीत होती है ।
राजगीर मुख्य रूप से पांच पहाड़ियों के समूह से घिरा हुआ है। प्राचीन बौद्ध और जैन साहित्य के साथ-साथ महाभारत में भी इन पहाड़ियों का विस्तृत वर्णन मिलता है। महाभारत के सभापर्व में इन्हें विपुल, वराह, वृषभ, ऋषिगिरि और चैत्यक कहा गया है, जबकि बौद्ध ग्रंथों में इन्हें वैभहार, पाण्डव, विपुला, गृध्रकूट और ऋषिगिरि के नाम से संबोधित किया गया है। वर्तमान समय में इन्हें निम्नलिखित पांच नामों से जाना जाता है:
वैभारगिरि (Vaibhargiri) - वैभारगिरि पहाड़ी राजगीर के उत्तर-पश्चिम में स्थित है और ऐतिहासिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस पहाड़ी के तलहटी क्षेत्र में ही राजगीर के प्रसिद्ध गर्म जल के झरने बहते हैं। पहाड़ी के शीर्ष पर प्राचीन जैन मंदिर, शिव मंदिर और गुफाओं के अवशेष हैं। इसी पहाड़ी की एक ढलान पर ऐतिहासिक 'सप्तपर्णी गुफा' स्थित है, जहाँ बौद्ध धर्म का सबसे पहला लिखित ढांचा तैयार हुआ था। विपुलांचल (Vipulachala) - गर्म पानी के कुंडों के ठीक उत्तर-पूर्व में स्थित विपुलांचल पहाड़ी जैन धर्म के अनुयायियों के लिए परम पवित्र स्थल है। जैन धर्म के ग्रंथों के अनुसार, २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने केवल ज्ञान प्राप्त करने के बाद अपना प्रथम उपदेश (दिव्य ध्वनि) इसी पहाड़ी पर दिया था। यहाँ से पूरी राजगीर घाटी का विहंगम दृश्य दिखाई देता है।।रत्नगिरि (Ratnagiri) पहाड़ी वर्तमान समय में राजगीर के पर्यटन का केंद्र बिंदु है। इसी पहाड़ी की चोटी पर सफ़ेद संगमरमर से निर्मित 'विश्व शांति स्तूप' स्थापित है। इस पहाड़ी पर चढ़ने के लिए भारत का पहला एरियल रज्जुमार्ग (Ropeway) बनाया गया था, जो आज भी पर्यटकों के आकर्षण का मुख्य कारण है। उदयगिरि (Udaygiri) - रत्नगिरि के समीप स्थित उदयगिरि पहाड़ी पर प्राचीन काल के कई जैन मंदिर और पुरातात्विक अवशेष बिखरे पड़े हैं। यह पहाड़ी प्राचीन काल में संन्यासियों के ध्यान और तपस्या का एक प्रमुख केंद्र थी। सोनगिरि (Songiri) -सोनगिरि या स्वर्णगिरि पहाड़ी का संबंध मगध के प्राचीन खजाने से जोड़ा जाता है। इसी पहाड़ी के निचले हिस्से में प्रसिद्ध 'सोन भंडार' गुफाएँ स्थित हैं, जिनके विषय में यह मान्यता है कि इनके भीतर प्राचीन मगध का अकूत स्वर्ण भंडार सुरक्षित है
: पुरातात्विक वैभव और स्थापत्य कला - राजगीर की धरती पर प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग और स्थापत्य के ऐसे बेजोड़ नमूने मौजूद हैं, जो समकालीन वैश्विक सभ्यताओं को टक्कर देते थे। साइक्लोपियन वॉल प्राचीन सैन्य वास्तुकला का राजगीर की पहाड़ियों की चोटियों पर रेंगती हुई प्रतीत होने वाली साइक्लोपियन वॉल (असुर सुरक्षा दीवार) भारत की सबसे प्राचीन मानव-निर्मित संरचनाओं में से एक है । इसका निर्माण ईसा पूर्व छठी या पांचवीं शताब्दी में हर्यक वंश के शासकों (बिम्बिसार और उनके पूर्वजों) द्वारा कराया गया था। : इस 40 किलोमीटर लंबी दीवार को बनाने में किसी भी प्रकार के गारे, चूने या सीमेंट का उपयोग नहीं किया गया है। पहाड़ियों से तोड़े गए विशाल पत्थरों को 'ड्राय स्टोन मैसनरी' और इंटरलॉकिंग तकनीक से एक-दूसरे के ऊपर इस तरह टिकाया गया है कि 2500 वर्षों के बाद भी इसका एक बड़ा हिस्सा सुरक्षित है। इसकी चौड़ाई लगभग 5 मीटर और ऊँचाई 4 मीटर तक है। वैश्विक स्तर पर इसकी तुलना ग्रीस के 'माइसीने' और पेरू के 'माचू पिचू' की दीवारों से की जाती है। वर्तमान में इसे यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में शामिल कराने के प्रयास जारी हैं।
सोन भंडार गुफाएँ: शंख लिपि और खजाने का रहस्य - वैभारगिरि पहाड़ी की तलहटी में स्थित सोन भंडार गुफाएँ चट्टानों को काटकर बनाई गई हैं। इसमें दो मुख्य कमरे हैं, जिनकी आंतरिक दीवारें मौर्यकालीन पॉलिश के कारण आज भी चमकती हैं। प्रवेश द्वार पर गुप्तकालीन ब्राह्मी लिपि का एक शिलालेख है, जो यह स्पष्ट करता है कि इन गुफाओं का निर्माण चौथी शताब्दी ईस्वी में जैन मुनि आचार्य वैरादेव द्वारा भिक्षुओं के ध्यान के लिए कराया गया था।
गुफा की एक दीवार पर रहस्यमयी 'शंख लिपि' (Shell Script) खुदे हुए हैं। लोकमान्यता है कि यह लिपि वास्तव में बिम्बिसार के सोने के खजाने को खोलने का गुप्त कोड है। ब्रिटिश काल में अंग्रेजों ने तोप के गोलों से इस दीवार को तोड़ने का प्रयास किया था, लेकिन वे असफल रहे। आज भी तोप के गोले का निशान गुफा के द्वार पर देखा जा सकता है । राजगीर की सबसे बड़ी विशेषता इसका बहु-सांस्कृतिक और बहु-धार्मिक स्वरूप है। यह नगर एक ही समय में विभिन्न धर्मों के महापुरुषों की आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र रहा है। राजगीर का प्राचीन नाम 'गिरिव्रज' था, जो महाभारत काल में मगध सम्राट जरासंध की राजधानी थी। जरासंध का अखाड़ा: राजगीर की घाटी में आज भी वह अखाड़ा मौजूद है जहाँ भगवान कृष्ण और अर्जुन के साथ आए महाबली भीम ने जरासंध के साथ 13 दिनों तक भयंकर मल्ल-युद्ध किया था। अंत में कृष्ण के कूटनीतिक इशारे पर भीम ने जरासंध के शरीर को दो टुकड़ों में चीरकर विपरीत दिशाओं में फेंककर उसका वध किया था। मलमास मेला और ब्रह्मकुंड: हिंदू पंचांग के अनुसार प्रत्येक तीसरे वर्ष यहाँ 'मलमास मेला' आयोजित होता है। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि इस एक महीने की अवधि में सनातन धर्म के सभी 33 करोड़ देवी-देवता राजगीर में वास करते हैं। इस दौरान यहाँ के मुख्य ब्रह्मकुंड में स्नान करने का अत्यधिक धार्मिक महत्व है।
बौद्ध संस्कृति का उद्गम और प्रथम संगीति - भगवान बुद्ध को राजगीर से अगाध प्रेम था। राजा बिम्बिसार ने उन्हें ठहरने के लिए 'वेणुवन' (बाँस का बगीचा) दान में दिया था, जो बौद्ध इतिहास का पहला संघ-विहार बना। गृध्रकूट पर्वत का अध्यात्म: इस पहाड़ी का आकार दूर से बैठे हुए गिद्ध जैसा दिखता है। यहाँ भगवान बुद्ध ने अपने जीवन के कई चातुर्मास बिताए और महायान बौद्ध धर्म के सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ 'प्रज्ञापारमिता सूत्र' और 'लोटस सूत्र' का उपदेश अपने प्रिय शिष्यों को दिया। सप्तपर्णी गुफा और प्रथम बौद्ध संगीति: ईसा पूर्व 483 में कुशीनगर में बुद्ध के महापरिनिर्वाण के तुरंत बाद बौद्ध संघ के बिखरने का खतरा पैदा हो गया था। तब बुद्ध के वरिष्ठ शिष्य महर्षि महाकश्यप की अध्यक्षता और सम्राट अजातशत्रु के संरक्षण में वैभारगिरि पहाड़ी की सप्तपर्णी गुफा में 500 अर्हत भिक्षुओं की 'प्रथम बौद्ध संगीति' बुलाई गई। इसी गुफा के भीतर छह महीने के मंथन के बाद बुद्ध के प्रिय शिष्य उपालि ने 'विनय पिटक' (नियम) और आनंद ने 'सुत्त पिटक' (उपदेश) का मौखिक संकलन किया, जो आज भी बौद्ध धर्म का मूल आधार है।
. जैन धर्म की पावन तीर्थभूमि - जैन धर्म में राजगीर का स्थान एक महातीर्थ के रूप में है। यह स्थान जैन धर्म के 20वें तीर्थंकर भगवान मुनिसुव्रतनाथ की गर्भ, जन्म, दीक्षा और केवल ज्ञान की भूमि है। २४वें तीर्थंकर भगवान महावीर ने अपने आध्यात्मिक जीवन के 14 चातुर्मास राजगीर और इसके समीपवर्ती नालंदा क्षेत्र में व्यतीत किए थे। राजगीर की पांचों पहाड़ियों पर बने प्राचीन जैन मंदिर और ध्यान गुफाएँ जैन वास्तुकला और दिगंबर व श्वेतांबर संप्रदायों की तपस्या पद्धति के जीवंत प्रतीक हैं।
सूफ़ी और सिख मत का संगम - मखदूम कुंड: राजगीर में केवल हिंदू, बौद्ध या जैन ही नहीं, बल्कि सूफ़ी संतों की करुणा भी बरसी है। 14वीं शताब्दी के महान सूफ़ी संत मखदूम शाह शरुफुद्दीन याह्या मनेरी ने यहाँ की पहाड़ियों में कई वर्षों तक एकांत साधना की थी। उनसे जुड़ा 'मखदूम कुंड' आज भी कौमी एकता और सूफ़ियाना इबादत का एक बड़ा केंद्र है।
शीतलकुंड गुरुद्वारा: सिख धर्म के प्रथम गुरु, गुरु नानक देव जी भी अपनी 'उदासी' (यात्रा) के दौरान राजगीर आए थे। जनश्रुति है कि जब स्थानीय लोगों ने पानी के अत्यधिक गर्म होने की समस्या बताई, तो गुरु नानक जी ने अपनी लाठी से भूमि को स्पर्श किया और वहाँ से शीतल जल की धारा फूट पड़ी, जो आज 'शीतलकुंड गुरुद्वारा' के रूप में पूजनीय है।
भूगर्भीय रहस्य: गर्म जल के झरने - राजगीर के आकर्षण का एक बड़ा हिस्सा वैभारगिरि और विपुलांचल पहाड़ियों के मिलन स्थल पर बहने वाले गर्म जल के झरने हैं, जिनमें 'ब्रह्मकुंड', 'सप्तधारा', 'व्यास कुंड' और 'अनंत कुंड' प्रमुख हैं। इन झरनों के निरंतर प्रवाह के पीछे विज्ञान और अध्यात्म दोनों के अपने तर्क हैं । वजिओथर्मल एनर्जी और गंधक ब्रह्मकुंड है। आधुनिक भूगर्भ विज्ञान के अनुसार, राजगीर की पहाड़ियाँ क्वारजाईट (Quartzite) पत्थरों से निर्मित हैं। इन पहाड़ियों के भीतर गहरी दरारें और फॉल्ट लाइन्स हैं। पृथ्वी की अत्यधिक गहराई में स्थित रेडियोधर्मी तत्वों और टेक्टोनिक प्लेटों की हलचल के कारण भूगर्भ में अत्यधिक ऊष्मा (Heat) होती है। जब सतह का पानी इन दरारों से नीचे जाता है, तो वह उबलने लगता है और हाइड्रोथर्मल प्रेशर के कारण ऊपर की ओर आता है। चट्टानों में मौजूद गंधक (Sulfur) और अन्य खनिज इस पानी में मिल जाते हैं, जिसके कारण यह जल औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है। इसमें स्नान करने से चर्म रोग और वात (गठिया) जैसी बीमारियों में अप्रत्याशित लाभ मिलता है।पौराणिक कथाओं के अनुसार, जब ब्रह्मा जी ने इस भूमि पर महायज्ञ किया था, तब राजा वसु ने देवताओं के स्नान के लिए इन जलधाराओं को एक स्थान पर एकत्रित कर 'ब्रह्मकुंड' का रूप दिया था। सप्तधारा का संबंध उन सात ऋषियों से है जिन्होंने लोक-कल्याण के लिए यहाँ तपस्या की थी। राजगीर प्राचीन इतिहास को अपने भीतर समेटे हुए आधुनिक विकास की ओर भी अग्रसर है। रत्नगिरि पहाड़ी पर चमकता हुआ विश्व शांति स्तूप (जिसका निर्माण जापानी बौद्ध भिक्षु फूजी गुरुजी के प्रयासों से 1969 में हुआ था) आज भी दुनिया को युद्ध से बुद्ध की ओर आने का संदेश दे रहा है। इसके साथ ही, हाल के वर्षों में निर्मित नेचर सफारी, जू सफारी और ग्लास स्काईवॉक (कांच का पुल) ने राजगीर को पर्यावरण-पर्यटन (Eco-Tourism) के मानचित्र पर भी स्थापित कर दिया है। "राजगीर केवल पत्थरों और पहाड़ियों का समूह नहीं है। यह भारतीय मेधा, दर्शन, सहिष्णुता और वास्तुकला का वह जीवित दस्तावेज़ है, जिसने ढाई हजार साल पहले पूरी दुनिया को अहिंसा, करुणा और शांति का मार्ग दिखाया था। इसकी विरासत को अक्षुण्ण रखना हमारी सांस्कृतिक अस्मिता को जीवित रखने के समान है।"
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