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यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा

यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा

कुमार महेंद्र
महलों का वैभव छोड़ कभी,
वन-पथ भी अपनाना होगा।
पीड़ित के मौन नयनों में,
अपना ही दर्द पढ़ना होगा।
अहिल्या के उद्धार सरीखी,
करुणा हृदय में धरना होगा।
शबरी के प्रेमिल बेरों का,
निष्कलुष माधुर्य चखना होगा।
यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा।।


रावण-सी हर कुदृष्टि का,
मन से अंत करना होगा।
अन्यायों की दहकती ज्वाला से,
निर्भय होकर लड़ना होगा।
नारी केवल देह नहीं,
जीवन का गौरव-गान भी है।
अर्धांगिनी के सम्मान को,
हृदय-सिंहासन देना होगा।
यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा।।


प्रेम नहीं अधिकार मात्र,
यह तो समर्पण की ज्वाला है।
विश्वासों के पावन दीपों से,
हर संशय गलने वाला है।
उत्ताल सिंधु की लहरों पर,
धैर्य-सेतु रचना होगा।
विपदाओं के घोर तमस में,
आशा बनकर जलना होगा।
यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा।।


वह त्याग, तपस्या, शक्ति है,
वह जीवन का आधार भी है।
यदि उसका पथ कंटकमय है,
तो कठिन तुम्हारा प्यार भी है।
सम्मान अगर उसका चाहो,
पहले स्वयं सँवरना होगा।
उसके स्वप्निल आँगन में,
स्नेह-सुमन बिखरना होगा।
यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा।।


प्रेम जहाँ मर्यादा बनकर,
हर संबंध सँभालता है।
रामत्व का दीप प्रज्वलित होते ही,
जीवन स्वयं उजालता है।
सीता पाने की अभिलाषा में,
केवल चाहत से क्या होगा?
सत्य, त्याग और धर्म-पथ पर,
प्रतिपल स्वयं ढलना होगा।
यदि चाहते हो सीता, तो राम तुम्हें बनना होगा।।


कुमार महेंद्र
(स्वरचित मौलिक रचना)
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