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"समर्पण का धर्म"

"समर्पण का धर्म"

पंकज शर्मा
रिश्ते शब्दों से नहीं बनते,
वे मौन के उन पुलों पर जन्मते हैं
जहाँ एक हृदय
दूसरे हृदय के लिए
अपना द्वार खोल देता है।


जो उन्हें लाभ-हानि में तौलते हैं,
वे उनका आकार तो देखते हैं,
पर उनकी आत्मा नहीं।
स्नेह का मूल्य नहीं होता,
उसकी केवल अनुभूति होती है।


हर निकटता एक उत्तरदायित्व है,
हर अपनापन एक साधना।
जैसे दीपक का धर्म प्रकाश है,
वैसे ही प्रेम का धर्म
निस्वार्थ समर्पण है।


जब समय की आँधियाँ उठती हैं,
और विश्वास की शाखाएँ काँपती हैं,
तब शब्द नहीं बोलते,
निष्ठा की जड़ें बोलती हैं,
धैर्य अपना परिचय देता है।


मैंने देखा है—
जो समर्पण से डरते हैं,
वे निकट होकर भी दूर रहते हैं;
और जो प्रेम को पूजा मान लेते हैं,
वे दूरी में भी साथ रहते हैं।


शायद इसी कारण
कुछ संबंध समय से बड़े हो जाते हैं।
वे किसी बंधन से नहीं,
श्रद्धा के सूक्ष्म सूत्र से जुड़े रहते हैं—
और जीवनभर उजाला देते हैं।


. स्वरचित, मौलिक एवं अप्रकाशित
✍️ "कमल की कलम से"✍️ (शब्दों की अस्मिता का अनुष्ठान)
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